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मेरे बचपन के दिनों में एक बार मेरे पिता एक सुन्दर सी टॉर्च लायेजिसके शीशे में गोल खांचे बने हुए थे जैसे आजकल कारों कि हेडलाईट में होते हैं हमारे इलाके में रोशनी कि वह पहली मशीन जिसकी शहतीर एक चमत्कार कि तरह रात को दो हिस्सों में बांट देती थी.एक सुबह मेरी पड़ोस की दादी ने पिता से कहा बेटा इस मशीन से चूल्हा जलाने कि लिए थोड़ी सी आग दे दोपिता ने हंसकर कहा चाची इसमें आग नहीं होती सिर्फ उजाला होता हैयह रात होने पर जलती है और इससे पहाड़ के उबड़-खाबड़ रास्ते साफ दिखाई देते हैंदादी ने कहा बेटा उजाले में थोड़ा आग भी रहती तो कितना अच्छा थामुझे रात को भी सुबह चूल्हा जलाने की फ़िक्र रहती हैघर-गिरस्ती वालों के लिए रात में उजाले का क्या काम बड़े-बड़े लोगों को ही होती है अंधेरे में देखने की जरूरत पिता कुछ बोले नहीं बस खामोश रहे देर तक.इतने वर्ष बाद भी वह घटना टॉर्च की तरह रोशनीआग मांगती दादी और पिता की ख़ामोशी चली आती हैहमारे वक्त की कविता और उसकी विडम्बनाओं तक.
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(कविता राधाकृष्ण प्रकाशन से साभार )