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'कविता की जुबां पर झूठ पिघल जाते हैं'

एक कविता रोज में आज पढ़िए सुशांत कुमार शर्मा की कविता.

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7 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 7 जुलाई 2016, 12:40 PM IST)
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सुशांत कुमार शर्मा बेतिया, बिहार के रहने वाले हैं. जेएनयू से हिंदी में एम ए करने के बाद अब दिल्ली यूनिवर्सिटी से एम फिल कर रहे हैं. कविताओं और गजलों का पुराना नशा है. हिंदी, भोजपुरी और संस्कृत में कविताएं लिखते हैं. भोजपुरी में एक महाकाव्य 'जटायु' लिख चुके हैं. अभी 'शबरी' पर महाकाव्य लिख रहे हैं. पढ़िए उनकी कविताएं.

आविर्भाव

मैं अपनी कविता में उतर रहा हूं स्वयं और मुझे डर इस बात का है कि कविता की जुबां पर झूठ पिघल जाते हैं शब्दाकार, ध्वन्याकार होने से पहले ही मेरे आत्मीय! मुझे माफ़ करना कि मैं तुम्हें माफ़ नहीं कर सकता


यादें ही यादें हज़ारों तरह की

यादें   ही   यादें    हज़ारों   तरह   की पलक  खोलते   पूछती   हैं  ये  आंखें वो  प्यारा  सलोना सा  चेहरा कहां है यही  कुछ  सवालात   हैं  आरिज़ों के सजा  चुम्बनों  से   वो  सहरा कहां है हटाते  ही   परदे    किरण  पूछती  है जगे  आज  क्यों   हो   अकेले-अकेले हवा  पूछती   है   कहां  है   वो  साथी यही    पूछते    हैं    चिरैयों    के   मेले मैं जब देखूं दर्पण सवाल है ये उसका कि आंखों में क्यों कोई  चेहरा नहीं है यही  पूछती   है   वो   पानी   की  बूंदें कि पलकों पे क्यों उसका पहरा नहीं है किसे  क्या  बताऊं  मैं  बातें  विरह की यादें   ही    यादें    हज़ारों    तरह    की


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