अनुराग पांडेय फिलहाल टीचर्स ट्रेनिंग में लगे हुए हैं. बीएचयू से बीए किया है.कविता लिखने की जिद रखते हैं. आज इनकी एक कविता आपको पढ़वा रहे हैं.-------------------------------------------------------------------------------- सुबह का शायरअनुराग पांडेय - चाहतों में रातें जगता जाने किसकी राहें तकता गिन सके वो सारेगिनता उंगलियों पर तारे गिनता उंगलियां पिघली हैं उसकी हाथ उसका जल गया है सुबह काशायर सयाना शाम होते ढल गया है फिजाओं में गूंजता था शोर सा देता सुनाई छोड़कर फिरथामता था एक अदा से वो कलाई पांव संभले थे मगर फिर संभल कर वो गिर गया है सुबह काशायर सयाना शाम होते ढल गया है सुबह की शाखों पर सजती धूप सा शबनम चुराता चाहतों कीबारिशों में भीगता मुझको भिगाता चाहत थी जिस पल की शायद पल वो उसको छल गया है सुबहका शायर सयाना शाम होते ढल गया है--------------------------------------------------------------------------------इस सीरीज की और कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने 'एक कविता रोज' टैग पर क्लिक करिए.