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एक कविता रोज: शहर का व्याकरण

सुदामा पांडेय 'धूमिल' का आज जन्मदिन है. पढ़िए उनकी एक कविता.

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9 नवंबर 2016 (Updated: 29 मार्च 2018, 10:50 AM IST)
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आज पढ़िए 'धूमिल' की कविता 'शहर का व्याकरण' .

शहर का व्याकरण

- शहर का व्याकरण ठीक करने के लिएएक हल्लागाड़ी गश्त कर रही हैचुनाव के इश्तहार से निकलकरएक आदमी सड़क पर आ गया हैआसमान में सन्नाटा छा गया हैशाम के सात बजे हैंभाषा के चौथे पहर में‘मैं प्रभु हूं’ का चेहरा उतार करवह विदूषकउस शो-केस के सामने खड़ा हैजिसमें जूते –पान की गिलौरियों की तरह सजे हैंऔर एक रर्रा विदेशी पर्यटक कापीछा कर रहा हैउसकी ज़ुबान पर अपने यहां गाये जानेवालेजंगल-गीत का प्यारा-सा छन्द है(आगे सड़क बन्द है)लाल बत्ती जल रही हैफर्माइशी गीतों की परिचित आवाज़ मेंसीमा पर तैनात जवानों का हौसला बुलन्द हैआज हर चीज़ एक नाम हैलोगों की सुविधा के लिएबनिया – सच्चाई हैयह महंगाई हैजिसने बाज़ार को चकमा दिया हैलोग आ रहे हैं – जा रहे हैंऔर ख़ुश हैं कि भीड़ सुख पा रहे हैंमगर सुनो! तुमने अपने कुत्ते कोदिन में क्यों खोल दिया हैइसके पहले कि वह पकड़ लिया जायऔर चीड़-फाड़ की किसी धारणा को साबित करते हुएअस्पताल में हलाल होअगर तुम उसे नगरपालिका की नज़र सेबचाना चाहते हो –उसके गले में एक पट्टा डाल दोसचमुच मजबूरी हैमगर जिंदा रहने के लिएपालतू होना जरूरी है. https://www.youtube.com/watch?v=6ZS021-gRro&index=30&list=PL1BQkm1ZUCaVTY1r9PwmD9BIGZxaU5WxE ***

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