आज पढ़िए अमृता प्रीतम की कविता 'शहर'.-------------------------------------------------------------------------------- मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है सड़कें - बेतुकी दलीलों-सी… और गलियाँ इस तरहजैसे एक बात को कोई इधर घसीटता कोई उधर हर मकान एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआदीवारें-किचकिचाती सी और नालियाँ, ज्यों मुँह से झाग बहता है यह बहस जाने सूरज सेशुरू हुई थी जो उसे देख कर यह और गरमाती और हर द्वार के मुँह से फिर साइकिलों औरस्कूटरों के पहिये गालियों की तरह निकलते और घंटियाँ-हार्न एक दूसरे पर झपटते जो भीबच्चा इस शहर में जनमता पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही? फिर उसका प्रश्न ही एकबहस बनता बहस से निकलता, बहस में मिलता… शंख घंटों के साँस सूखते रात आती, फिरटपकती और चली जाती पर नींद में भी बहस ख़तम न होती मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरहहै…. ***