एक कविता रोज में आज पढ़िए पंकज चतुर्वेदी को.-------------------------------------------------------------------------------- सरकारी हिंदी - डिल्लू बापू पंडित थे बिना 'वैसी' पढ़ाई के जीवन में एक ही श्लोक उन्होंने जानावह भी आधा उसका भी वे अशुद्ध उच्चारण करते थे यानी ‘त्वमेव माता चपिता त्वमेवत्वमेव बन्धुश चसखा त्वमेव’ इसके बाद वे कहते कि आगे तो आप जानते ही हैं गोया जो सबजानते हों उसे जानने और जनाने में कौन-सी अक़्लमंदी है? इसलिए इसी अल्प-पाठ केसहारे उन्होंने सारे अनुष्ठान कराए एक दिन किसी ने उनसे कहा: बापू, संस्कृत में भूखको क्षुधा कहते हैं डिल्लू बापू पंडित थे तो वैद्य भी उन्हें होना ही था नाड़ीदेखने के लिए वे रोगी की पूरी कलाई को अपने हाथ में कसकर थामते आंखें बंद कर मुंहऊपर को उठाये रहते फिर थोड़ा रुककर रोग के लक्षण जानने के सिलसिले में जो पहलाप्रश्न वे करते वह भाषा में संस्कृत के प्रयोग का एक विरल उदाहरण है यानी ‘पुत्तू!क्षुधा की भूख लगती है क्या?’ बाद में यही सरकारी हिन्दी हो गयी *** (कविता कोश सेसाभार)