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एक कविता रोज: 'पुत्तू! क्षुधा की भूख लगती है क्या?’

आज पढ़िए पंकज चतुर्वेदी की कविता 'सरकारी हिंदी'.

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प्रतीक्षा पीपी
30 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 6 मई 2016, 10:56 AM IST)
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एक कविता रोज में आज पढ़िए पंकज चतुर्वेदी को.
 

सरकारी हिंदी 

- डिल्लू बापू पंडित थे बिना 'वैसी' पढ़ाई के जीवन में एक ही श्लोक उन्होंने जाना वह भी आधा उसका भी वे अशुद्ध उच्चारण करते थे यानी ‘त्वमेव माता चपिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश चसखा त्वमेव’ इसके बाद वे कहते कि आगे तो आप जानते ही हैं गोया जो सब जानते हों उसे जानने और जनाने में कौन-सी अक़्लमंदी है? इसलिए इसी अल्प-पाठ के सहारे उन्होंने सारे अनुष्ठान कराए एक दिन किसी ने उनसे कहा: बापू, संस्कृत में भूख को क्षुधा कहते हैं डिल्लू बापू पंडित थे तो वैद्य भी उन्हें होना ही था नाड़ी देखने के लिए वे रोगी की पूरी कलाई को अपने हाथ में कसकर थामते आंखें बंद कर मुंह ऊपर को उठाये रहते फिर थोड़ा रुककर रोग के लक्षण जानने के सिलसिले में जो पहला प्रश्न वे करते वह भाषा में संस्कृत के प्रयोग का एक विरल उदाहरण है यानी ‘पुत्तू! क्षुधा की भूख लगती है क्या?’ बाद में यही सरकारी हिन्दी हो गयी *** (कविता कोश से साभार)

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