एक कविता रोज: 'पुत्तू! क्षुधा की भूख लगती है क्या?’
आज पढ़िए पंकज चतुर्वेदी की कविता 'सरकारी हिंदी'.
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एक कविता रोज में आज पढ़िए पंकज चतुर्वेदी को.
सरकारी हिंदी
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डिल्लू बापू पंडित थेबिना 'वैसी' पढ़ाई केजीवन में एक ही श्लोकउन्होंने जानावह भी आधाउसका भी वेअशुद्ध उच्चारण करते थेयानी ‘त्वमेव माता चपिता त्वमेवत्वमेव बन्धुश चसखा त्वमेव’इसके बाद वे कहतेकि आगे तो आप जानते ही हैंगोया जो सब जानते होंउसे जानने और जनाने मेंकौन-सी अक़्लमंदी है?इसलिए इसी अल्प-पाठ के सहारेउन्होंने सारे अनुष्ठान कराएएक दिन किसी ने उनसे कहा:बापू, संस्कृत में भूख कोक्षुधा कहते हैंडिल्लू बापू पंडित थेतो वैद्य भी उन्हें होना ही थानाड़ी देखने के लिए वेरोगी की पूरी कलाई कोअपने हाथ में कसकर थामतेआंखें बंद करमुंह ऊपर को उठाये रहतेफिर थोड़ा रुककररोग के लक्षण जानने के सिलसिले मेंजो पहला प्रश्न वे करतेवह भाषा मेंसंस्कृत के प्रयोग काएक विरल उदाहरण हैयानी ‘पुत्तू! क्षुधा की भूखलगती है क्या?’बाद में यहीसरकारी हिन्दी हो गयी
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(कविता कोश से साभार)