The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Sports
  • Ek Kavita roz: Sadho! E Murdan ke Gaon By Baabusha Kohli

'पूरी बारिश भीगती रही हूं एकांत के गीलेपन में'

एक कविता रोज़: साधो! ई मुर्दन के गांव

Advertisement
pic
16 जुलाई 2017 (अपडेटेड: 16 जुलाई 2017, 01:37 PM IST)
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
Quick AI Highlights
Click here to view more
बाबुशा मध्य प्रदेश से हैं. ख़ूब लिखती हैं, अपनी कलम से कभी गिलहरियों को पकड़ती हैं तो कभी चांद नोंच लाती हैं. दोस्तों पर जान छिड़कती हैं. फेसबुक पर लाइक कमाने के साथ ही एक किताब भी छप चुकी है इनकी. इनका लिखा पहले भी हम पढ़वा चुके हैं आपको. ये भी पढ़िए. मज़ा आएगा. ये कविता बाबुशा ने अपने रंगकर्मी मित्र आशीष पाठक के लिए लिखी थी.
आह ! मेरे जुड़वां प्रेत ! कितनी रातें आसमान को टुकड़ा-टुकड़ा खाया हमने इच्छा की टहनियों पर टंगे हुए हवाओं की नमी में डुबो-डुबो चबाए सितारे कर लिया मन चूरा जुगालियों में कल तक ज़मींदार का खेत था अपना जीवन और हम बिचारे ! अंखुआए हुए नरम- नरम दाने जरई के हम कैसे पगले प्रेत हैं कि प्रेम करते साधकों के जैसे और साधना करते हैं प्रेम में यूं कि मानो वही अपना औलिया हो वही हो निज़ाम जंजपूक प्रेत हम जीवन के अपने ज़मींदार का नाम जपते ओ मेरे जिगरी ! वो लोग सोचते हैं कि उन्होंने अपनी कलाई पर घड़ी बांध रखी है इसके उलट वक़्त उन्हें बांधे रखता है अपने इशारों पर नियम वही अपने साथ भी लागू है कि हम लोग अपनी जान हथेली पे बांधे रखते हैं हमारे हाथ हमारे प्राणों को कस कर पकड़े हुए कविता मेरा हाथ है और रंगमंच तुम्हारा हम आसमान खाते हैं टुकड़ा-टुकड़ा रात भर मरते-गिरते-जूझते अपने हिस्से के टुकड़े के लिए हम प्रेत हैं अंतिम सत्य की खोज में भटकते बंधु ! पूरी बारिश भीगती रही हूं एकांत के गीलेपन में और स्वप्न की धूप में सुखाती रही भीगी नश्वर देह एक रोज़ बहा आई मैं कान के बुंदे नरबदा जी की धार में वही कान के बुंदे जिनके पेंच में उलझी पड़ी थीं उत्तर की खंडित हवाएं दोस्त ! मेरे रक्त में एक अनोखा जीवाणु पाया गया है और सकते में हैं वैद्य-हकीम ये वही कीड़ा है जो तुम्हारे लहू में भी कुलबुलाता  है हम लार बहाते लपर-लपर चख लेते जीवन जीवन बेरहम बिना किसी चेतावनी के हमें लील लेता है नींद टूटने से स्वप्न कभी नहीं टूटते वो धड़कते हैं हमारे भीतर आजीवन जागने का अर्थ आंख का खुलना भर नहीं होता भरम चटक जाते हैं जाग की आहट भर से कितने तो बीहड़ पार किए हमने कितने जन्म लिए एक-एक जन्म में कितनी बार जिए कितनी बार मरे अपने हिस्से की रातों को पीकर अमर हुए हम प्रेत हैं परिव्राजक कोई अचरज की बात नहीं कि ओझा- तांत्रिक हमारे भय से दूर भाग जाते हैं हम बाजना मठ की सिद्ध घन्टियों में बजते जाबालि की नगरी में गूंजते साथी ! तुम अपने स्वप्न की सेंक को नरबदा जी में बहा आना और लेते आना चिताओं की आंच जेबें भर-भर अरसा बीता मैंने तकिये का गिलाफ़ नहीं बदला अब तो गाहे-ब-गाहे मैं धूप बदल देती हूं मज़े से सुखा लेती हूं अपने एकांत के गीलेपन को ग्वारीघाट की दहकती हुई लकड़ियों की आंच में मित्र ! तुम भी अपनी जेब में हाथ डालो मन बुझे तो बुझे अमन का दीया अंतस में जला लो हम प्रेत है साधक लहटते नहीं किसी पर, उल्टे मुक्त कर देते हैं आओ ! आओ ! मेरे जुड़वां प्रेत ! ग्वारीघाट की सीढ़ियों पर बैठकर मूंगफली चबाई जाए किसी अधजली चिता के अंगार में भूनकर हम तो जरछार हैं और जान चुके हैं सब जलेगा अंत में तुम देखना, पियारे  ! हवा में उड़ाकर पीछे फेंके हुए छिल्के मूंगफली के गिरेंगे संसार भर में.

ये भी पढ़ें:

'माइग्रेन' का कोई रंग होता तो वह निश्चित ही हरा होता

Advertisement

Advertisement

()