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ट्रकों का एक काफिला, इस शहर को लादे ले जा रहा था

एक कविता रोज़ में आज पढ़िए रवि कांत की कविता 'रीवा'

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28 मई 2016 (अपडेटेड: 28 मई 2016, 01:24 PM IST)
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रवि कांत इलाहाबाद के हैं, रहते दिल्ली में हैं, मीडिया वाले हैं, मीडिया वालों के लिए दिल्ली- नोएडा एक हो जाता है.  आज एक कविता रोज़ में उनकी कविता 'रीवा' पढ़िए.

(इलाहाबाद के रिक्शाचालकों के लिए)

रीवा एक भोला-भाला शहर है जिसकी बांह में जिंदगी को, देश को और भी बहुत सी चीजों को आगे खींचने की ताकत है यह शहर अपने अभावों के प्रति संवेदनशील, किंतु अपने गौरव से वंचित है

मेरे सपने में यह शहर छोटा भाई बनकर आता है, और रात-भर, मेरे बगल में उनींदा लेटा रहता है एक दिन इसने मुझसे कहा

मैं उत्तरप्रदेश में मिल जाना चाहता हूं, जैसे बहुत सारे शूद्र मुसलमान हो जाना चाहते हैं

मैंने उसे समझाया जैसे साठ साल वैसे कुछ और धैर्य रखो तुम्हारी भी पूछ होगी तुम्हारा श्रम इसी तरह नहीं मारा जाता रहेगा सरकार जरूर कुछ विकास करेगी लेकिन वह नहीं माना धीरे-धीरे भयापे से भरा उसका गला पतला होने लगा और वह सोए हुए लोगों के 'बाबूजी' कहने लगा

मेरी नींद कुछ टूटी तंद्रा में ही मैने कहा जाओ रीवा! जाओ भोपाल जाओ दिल्ली के किसी बड़े फाटक में जाकर अंड़स जाओ आवाज लगाओ

जब मेरा पैर चारपाई के नीचे की ठंडी जमीन पर पड़ा मेरे कमरे को रौंदता हुआ ट्रकों का एक काफिला इस शहर को लादे ले जा रहा था पता करने पर मालूम हुआ एक विशालकाय रिक्शेवाले के रूप में यह शहर पहले इलाहाबाद के आस-पास घूमता है फिर बहुत सारे रिक्शों में तब्दील हो जाता है


एक कविता रोज: प्रेम, बारिश और इंक़लाब

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