ये कविता लिखी है देवेंद्र अहिरवार ने. देवेंद्र को आपने लल्लनटॉप अड्डे पर रंगजमाते देखा. सुरों के साथ. साज के साथ. मगर इन सबके साथ उनके पास शब्द भी हैं. जैसेये कविता. देवेंद्र मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड एरिया के छतरपुर शहर से आते हैं. मध्यप्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा के पहले बैच के पासआउट हैं. कैलेंडर उस साल को 2012 दिखारहा था. अब साल 2016 है. देवेंद्र दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में हैं. औरयहां भी. नीचे यहीं. पढ़ें आप भी.--------------------------------------------------------------------------------मेरे तलुओं पर चलती हैं ज़मीन,और रास्ता चिपक जाता हैं मेरे जूतों से,जूते, मेरे पैरों को रोज़ पहन लेते है !एक कुर्सी आ के बैठ जाती है मुझ पर,और की-बोर्ड खेलता हैं मेरे हाथों से,माउस दबाता रहता हैं मेरी तीसरी उंगली !चाय और सिगरेट दोनों साथ मिल के पीते हैं मुझे,और फेंक देते हैं डस्टबिन में या सड़क के किनारे !दिन भर पूरा शहर भागता हैं मुझमें,शाम होते ही मेरा कमरा लौट आता हैं मुझमें,फिर कपड़े मुझे उतारते हैं ,जूते मुझे खोलते हैं !और बिस्तर मुझे झाड़ के बिछा लेता है,और लेट जाता है मेरी पीठ पर, तकिया लगाके !फिर एक किताब में बैठी अनजान कविता पढ़ती है,मेरी आंखें और बहला लेती है ख़ुद को !बिस्तर करवट बदल कर मेरे सीने पर सो जाता है.और मिटा लेता है अपने पूरे दिन की थकान !अक्सर सुबह होने से पहले नींद के साथ मिल के ख़्वाब, देख लेते हैं मुझे,और फिर सुबह होते ही बिस्तर मुझे छोड़ देता है !सच कहूं तो अब मुझे रात से नहीं, दिन से डर लगता है,क्योंकि मेरे तलुए ज़मीन का बोझ ढोते ढोते छिल गए हैं,फिर भी जूते बिना रहम खाए रोज़ पहन लेते हैं मेरे ज़ख़्मी पैर !और दिन भर पूरा शहर चीखता है मुझमें,पर किसी तरह दिन मुझे गुज़र लेता है मुझे डर हैं कि,कहीं मैं, हमेशा के लिए न गुज़र जाऊं,मैं गुज़र गया तो मेरी जान तुम अकेली कैसे रहोगी !