मनीष पाण्डेय 'आशिक' उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी के हैं. पेशे से इलेक्ट्रॉनिक्सएंड टेलिकॉम इंजीनियर हैं. दिल से लेखक-गायक हैं.छतछतें देखती हैं, अपने कोनों किनारों से कुछ उचककर कभी उछलकर सुना है जब से घरों मेंमंज़िलें बढ़ी छतें छोटी हो गई.साथ ही छोटे हो गए वो सपने जो छत पर पला करते थे यहीं खेल खेलते वक़्त हम घुटनों केबल चला करते थे गर्म रातों को जुगनू देखने की आरज़ू में हम बिजली गुल होने की दुआकरते थे यहीं नानी की कहानियों के हम शहजादे हुआ करते थे.यहीं नजर के मिलने हटने और फिर मिलके एक मुस्कुराहट में बदलने में जवां प्यार पनपतेथे आशिक किताबों में छिपाकर अपनी शक्ल दिन रात माशूका का नाम जपते थे वक़्त लगता थागीले कपड़ों को तारों में लटकने में लूटते थे दिल हसीं चेहरे भीगी जुल्फ झटकने मेंजहां चांद हर रात डाकिया बनकर खत पहुंचाता था होता था दिन पूरा जब महबूब नजर आता थावो छत मुझे अब वीरान नजरों से देखती है कुछ बरस हुए मुंह से लहू फेंकती है उग आए हैउसपे कुछ बबूल कांटे सांसे उसकी अब चलते हुए फूलने लगती हैमैं सोचता हूं जो किसी रोज एक पतंग जिसपे लिखी हो एक मोहब्बत की गजल कहीं से कट करगिर आए छत पर और छत की नब्ज जुड़ जाए सांस फिर से चलने लगे और प्यार फिर से पलनेलगे.