अमिताभ हिंदी कविता में वापसी की आवाज हैं. वह सालों पहले कविता की दुनिया से चलेगए थे. लेकिन यह कहना भी सही नहीं लगता क्योंकि जब वह लौटे तो उनके पास कविताओं कीएक अलग ही दुनिया थी. यह अलगपन बहुत सराहा गए. दरभंगा में रह रहे अमिताभ अब लगभगरोज़ एक कविता लिखते हैं. आज उन्होंने जो कविता लिखी है, वह इस मौसम में बहुतप्रासंगिक है. लीजिए पढ़िए...कुहासे का गीत ओ अमर घने कुहासे, तुम रहो कुछ देर यूं ही पर्दा बनकर शोर मचाते बच्चे प्रकट होंजैसे मंच पर अभिनेता मृत्यु के स्मरण को आनंददायी बना दो स्मृतियों का सारा अम्ल,सारा जहर काट दो उन्हें शीतल कर दो रुको अभी कि पौधों-पत्तियों को ठिठुराते हुए जीभर तुम्हें देख सकूं तुम्हारे दम से ही आदमी का प्रकृति को सुंदर बनाने का सुझावइतना रहस्यमय लग रहा है सुनो अमर घने कुहासे, छुट्टी के बारे में कोई तुमसे ही पूछरहा है कोई तुमसे ही कह रहा है क्या मैं पहले तो नहीं आ गई “खुरपी यहां है भैया”जैसी साधारण सूचना को आह, तुमने कितना नाटकीय बना दिया ओ मेरे घने अमर कुहासे...