कुछ होता है, ना होने के लिए, कुछ नहीं होता, होने के लिए
एक कविता रोज़ में आज पढ़िए दुष्यंत की कविता 'कुछ'

कुछ स्वप्न कभी पूर्ण नहीं होते उनकी अस्मिता उनकी अपूर्णता में ही होती है
कुछ अपेक्षाएं टूटने के लिए ही बनी होती हैं आकाश के कुछ तारों की तरह
कुछ की लाज बची रहती है, कुछ ना होने में कुछ बिखरने में भी बन जाते हैं
कुछ सच झूठ ही बने रहते हैं सदैव जैसे किसी का अस्तित्व
कुछ सुन्दर ही जन्म लेते हैं कुछ सफ़ल और प्रतिष्ठित कुछ नाकाबिल ही आते हैं इस धरती पर!
कुछ बीज धरती में समाकर भी नहीं अंकुरित होते कुछ अनुभव कभी कविता में नहीं ढ़लते
कुछ हरे पत्ते गिर सकते हैं किसी भी समय टहनी से वे पीले पड़ने और पतझड़ की ऋतु आने का इंतजार नहीं करते
कुछ नदियां प्यासी ही दम तोड़ देती हैं कुछ पाखी बिना उड़ान भरे ही पूर्ण कर लेते है अपनी यात्रा
कुछ था मेरा बेशकीमती जो छूट गया है घग्घर नदी के उस किनारे पर इसलिए कुछ हासिल भी अप्राप्त ही लगता है आजीवन कुछ था जो एक पूरे चांद की रात अधूरा रह गया था
कुछ होता है, ना होने के लिए कुछ नहीं होता, होने के लिए कुछ नहीं होने में भी छुपा होता है कुछ होना सब कुछ समा जाता है अंतत: 'कुछ नहीं' में 'कुछ नहीं' की नियति में संभव है 'सब कुछ' हो जाना
बस इसी कमबख्त कुछ ने जीना हराम कर रखा है
कल एक कविता रोज़ में आपने पढी थी कविता - एक कविता रोज: 'खाट बिछा लो आंगन में, लेटो, बैठो, आराम करो'

