शमशेर बहादुर सिंह की कल जन्मतिथि थी. इस मौके पर उनकी कविताएं तो सबको बहुत यादआईं, लेकिन शे'र कम. आज एक कविता रोज़ में सुबह-सुबह शमशेर को याद करते हुए पेश हैंउनके कुछ बहुत मशहूर शे'र... जी को लगती है तेरी बात खरी है शायदवही शमशेर मुज़फ़्फ़रनगरी है शायदआज फिर काम से लौटा हूं बड़ी रात गएताक़ पर ही मेरे हिस्से की धरी है शायदमेरी बातें भी तुझे ख़ाबे-जवानी-सी हैंतेरी आंखों में अभी नींद भरी है शायद***कोई तो साथ-साथ मेरी बेख़ुदी में थामैं कैसे अपने होश में आया ज़वाब दोउम्मीदे-वस्ल हो, कि बहाना हयात कातुम मेरे दिल में हो, मेरे दिल का ज़वाब दो***तू मेरे एकांत का एकांत हैमैं समझता था कि मेरा तू नहीं***इश्क़ की इंत हा तो होती हैदर्द की इंतहा नहीं होती***कितने बादल आए, बरसे औ' गएजिनके नीचे मैं पड़ा सुलगा किया!छिपके बैठे मेरे दिल की चोट मेंआपने अच्छा किया, पर्दा कियारुक गए हैं क्यों ज़मीनो-आसमां कुछ कनखियों से इशारा-सा कियाशमशेर की एक कालजयी कविता 'टूटी हुई बिखरी हुई' यहां पढ़ें :'तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियां लहरों से करती हैं'