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एक कविता रोज: 'खाली समय में भी बहुत से काम हैं'

आज पढ़िए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता 'खाली समय में'.

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फोटो - thelallantop
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प्रतीक्षा पीपी
28 अप्रैल 2016 (अपडेटेड: 6 मई 2016, 10:57 AM IST)
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आज पढ़िए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता 'खाली समय में'. और सुनिए इसे केतन की आवाज में.


https://www.youtube.com/watch?v=aY02qr4JdQs&feature=youtu.be
खाली समय में,बैठ कर ब्लेड से नाखून काटें,बढ़ी हुई दाढ़ी में बालों के बीच कीखाली जगह छांटें,सर खुजलाएं, जम्हुआएं,कभी धूप में आएं,कभी छांह में जाएं,इधर-उधर लेटें,हाथ-पैर फैलाएं,करवटें बदलेंदाएं-बाएं,खाली कागज पर कलम सेभोंडी नाक, गोल आंख, टेढ़े मुंहकी तस्वीरें खींचेंबार-बार आंखें खोलेंबार-बार मींचें,खांसें, खंखारें,थोड़ा-बहुत गुनगुनाएं,भोंडी आवाज में,अखबार की खबरें गाएं,तरह-तरह की आवाजगले से निकालें,अपनी हथेली की रेखाएंदेखें-भालें,गालियां दे-दे कर मक्खियां उड़ाएं,आंगन के कौओं को भाषण पिलाएं,कुत्ते के पिल्ले से हाल-चाल पूछें,चित्रों में लड़कियों की बनाएं मूंछेंधूप पर राय दें, हवा की वकालत करें,दुमड़-दुमड़ तकिए की जो कहिए हालत करें,खाली समय में भी बहुत से काम हैंकिस्मत में भला कहां लिखा आराम है! ***

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