कुमार अंबुज का कवि-व्यक्तित्व हिंदी कविता के इलाके में पर्याप्त चर्चावान औरस्वीकृत है. इस अस्तित्व पर आपत्तियां भी लगभग नहीं हैं. एक लिखित व्यवहार में यहनिर्विवाद सुख कुमार अंबुज को बीसवीं सदी के नवें दशक की हिंदी कविता का एक प्रमुखदस्तखत मान लेने के लिए बहुत हैं. अंबुज की अब तक कविताओं की पांच किताबें प्रकाशितहो चुकी हैं. ‘इच्छाएं’ नाम से एक कहानियों की किताब भी है. आज एक कविता रोज़ मेंपेश है कुमार अंबुज की एक कविता 'कई जन मित्र नहीं रह पाते हैं'... कभी उनकी आंखों में एक कौंध दिखी थी उसी ने बांधे रखा हमें बरसों कि बाकी अंधेरे हमसोचते रहे कि एक दिन उस चमक से काफूर हो जाएंगे या निकल आएगा उनका कोई उज्ज्वलसमाधान लेकिन जैसा कि कहा गया है पत्थर हमेशा पत्थर की तरह जीवन जीना चाहता है औरचींटी चींटी की तरह जैसे एक सच्चा चित्रकार या गायक चित्रकार और गायक की तरह फिर हमही एक दिन इस इंतजार से थक जाते हैं कि आखिर वह कब तक बाज नहीं आएगा और तुमसे वैसाप्यार या बर्ताव करेगा जिसकी उम्मीद उस कौंध से पैदा हुई थी शायद ज्यादा मुमकिन हैकि उसे भी वैसी ही कोई चमक मुझमें दिखी हो किसी दुर्निवार प्रेम की या पागलपन की याअंधेरे जल में गिरती रोशनी की और अब उसे न राख दिखती हो और न ही पानी में कोई छाया