मनोज कुमार झा हिंदी के उन कवियों में से हैं जो दिल्ली से दूर रह कर खुद के कवि कोसिद्ध कर चुके हैं. मनोज दरभंगा में रहते हैं और अप्रतिम कविताओं का एक लोक निर्मितकर चुके हैं. 'तथापि जीवन' शीर्षक से कविताओं की एक किताब छप चुकी है. अनुवादक भीमनोज खासे हैं. दर्शन में भी दिलचस्पी है और उस पर घंटों बात कर सकते हैं. आज एककविता रोज़ में पेश है मनोज कुमार झा की एक कविता : ज्ञानऐसे ही घूमते रहोगे रौद्र धूप भीषण बारिश में दरवाजे खटखटाते रहोगे सब सोए होंगेतुम्हारी दस्तक निष्फल जाएगी कोई लाठी लेकर निकलेगी कुत्ते की आशंका में तुम्हेंदेखकर कोई कंधे पर हाथ नहीं रखेगा इतना तक नहीं कहेगा कि मेरी आशंका निर्मल थी जहांबिलकुल आशंका नहीं वहां भी अपमानित होओगे इसलिए नहीं कि तुम बड़े कुशाग्र हो याबड़े मूर्ख या बड़े नेक हो या बड़े पाखंडी बस इसलिए कि तुम्हें अन्न से प्रेम है जलसे और धरती से और मनुष्य के प्रेम से बल्कि सचमुच सोच सको तो प्रेम की नहीं तुम्हेंइनकी जरूरत है तुम चाहोगे कि जरूरत को प्रेम की तरफ झुका दो मगर लोग तुम्हारे प्रेमको जरूरतों की तरफ झुका देंगे भटकते फिरोगे इसलिए नहीं कि मणि के खींच लेने के बादका घाव है तुम्हारे माथे पर बल्कि इसलिए कि यह पृथ्वी बड़ी सुंदर है और तुम जानतेहो कि यह पृथ्वी बड़ी सुंदर है--------------------------------------------------------------------------------वीडियो- एक कविता रोज़: सच्चा प्यार