एक कविता रोज में हम आपको पढ़ा रहे हैं काकेसी की ग़ज़ल. काकेसी, अजीब सा नाम है न. येआदमी भी वैसा ही है. एपल के लैपटॉप से नजरें उठाएगा और बातें करेगा बिहार के गुलडेज की. जब देवघर के सब लड़कों ने मिलकर गुलसंघ बनाया था. टेलर स्विफ्ट का नया गानासुनकर उठेगा और सुट्टा पीने जाएगा. वहां बताएगा मिथुन के ओए वाले स्टेप के तकनीकीपेच. थिरता नहीं कमबख्त कहीं. लिखता नहीं कुछ भी टिककर. और जो जब लिख देता है. तोअकलटॉप हो जाता है. कहता है कि कविता क्या है. फिर जवाब देता है कि तुकबंदी है. औरटीप जोड़ता है कि मामला जल्दी सरकाने का है क्योंकि दुनिया अब रोज के बदलने काइंतजार नहीं करती. हर सेकंड शकल बदलती है. इसलिए मैं तुकबंदी को क्विक ढंग से करताहूं. क्विकबंदी कहता हूं. उसी संदूकची से ये लड़ लाए हैं आपके वास्ते. -सौरभ-------------------------------------------------------------------------------- किस सिम्त ये ना पूछो, बूझो कि चल रहा है बस आगे बढ़ रहा है, मेरा देश बदल रहा हैमुझे जख्म देने वाले, तुझे मेरी सब दुआएं रिस-रिस के उससे एक-एक अरमां निकल रहा हैउस दल को तुमने पिछले दंगल में जिताया था अब वो दल तुम्हारी छाती पर मूंग दल रहा हैसीने में इक ख़ला है, सीने में ही पला है सीने में जो जलन है, सीना ही जल रहा हैहुज्जत यहां है किसकी हुज्जत में तुम पड़ो ना इज्जत बची तो समझो अच्छा ही चल रहा हैमंजिल का हौसला था, तूने पांव काट डाले उसके हाथ ही बचे हैं, सो हाथ मल रहा हैगंगा निकल गई है, हाथों से हिमालय के दुष्यंत, तुम्हारे पीर का पर्वत पिघल रहा है--------------------------------------------------------------------------------अगर आप भी कविता/कहानी लिखते हैं, और चाहते हैं हम उसे छापें. तो अपनी कविता/कहानीटाइप करिए, और फटाफट भेज दीजिए lallantopmail@gmail.com पर. हमें पसंद आई, तोछापेंगे. ‘एक कविता रोज’ की दूसरी कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने ‘एक कविता रोज’ टैगपर क्लिक करिए.