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एक कविता रोज: 'बस आगे बढ़ रहा है, मेरा देश बदल रहा है'

एक कविता रोज में पढ़िए काकेसी की एक ग़ज़ल.

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प्रतीक्षा पीपी
8 जून 2016 (अपडेटेड: 8 जून 2016, 10:24 AM IST)
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एक कविता रोज में हम आपको पढ़ा रहे हैं काकेसी की ग़ज़ल. काकेसी, अजीब सा नाम है न. ये आदमी भी वैसा ही है. एपल के लैपटॉप से नजरें उठाएगा और बातें करेगा बिहार के गुल डेज की. जब देवघर के सब लड़कों ने मिलकर गुलसंघ बनाया था. टेलर स्विफ्ट का नया गाना सुनकर उठेगा और सुट्टा पीने जाएगा. वहां बताएगा मिथुन के ओए वाले स्टेप के तकनीकी पेच. थिरता नहीं कमबख्त कहीं. लिखता नहीं कुछ भी टिककर. और जो जब लिख देता है. तो अकलटॉप हो जाता है. कहता है कि कविता क्या है. फिर जवाब देता है कि तुकबंदी है. और टीप जोड़ता है कि मामला जल्दी सरकाने का है क्योंकि दुनिया अब रोज के बदलने का इंतजार नहीं करती. हर सेकंड शकल बदलती है. इसलिए मैं तुकबंदी को क्विक ढंग से करता हूं. क्विकबंदी कहता हूं. उसी संदूकची से ये लड़ लाए हैं आपके वास्ते. -सौरभ
 

किस सिम्त ये ना पूछो, बूझो कि चल रहा है बस आगे बढ़ रहा है, मेरा देश बदल रहा है

मुझे जख्म देने वाले, तुझे मेरी सब दुआएं रिस-रिस के उससे एक-एक अरमां निकल रहा है

उस दल को तुमने पिछले दंगल में जिताया था अब वो दल तुम्हारी छाती पर मूंग दल रहा है

सीने में इक ख़ला है, सीने में ही पला है सीने में जो जलन है, सीना ही जल रहा है

हुज्जत यहां है किसकी हुज्जत में तुम पड़ो ना इज्जत बची तो समझो अच्छा ही चल रहा है

मंजिल का हौसला था, तूने पांव काट डाले उसके हाथ ही बचे हैं, सो हाथ मल रहा है

गंगा निकल गई है, हाथों से हिमालय के दुष्यंत, तुम्हारे पीर का पर्वत पिघल रहा है


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