‘दुनिया रोज़ बनती है’ शीर्षक से कविताओं की एक किताब रचने वाले आलोक धन्वा के यहां कविता रोज़ नहीं बनती है. लेकिन जब भी बनती है काबिले-गौर बनती है. बहरहाल, मुल्क में माहौल इन दिनों कुछ यों है कि दुर्भाग्य से आलोक धन्वा की एक कभी भी पुरानी न पड़ने वाली कविता याद आ रही है. आज एक कविता रोज़ में पढ़िए उनकी ये कविता :
फर्क
देखना
एक दिन मैं भी उसी तरह शाम में
कुछ देर के लिए घूमने निकलूंगा
और वापस नहीं आ पाऊंगा!
समझा जाएगा कि मैंने खुद को खत्म किया!
नहीं, यह असंभव होगा
बिल्कुल झूठ होगा!
तुम भी मत यकीन कर लेना
तुम तो मुझे थोड़ा जानते हो!
तुम जो अनगिनत बार मेरी कमीज के ऊपर ऐन दिल के पास लाल झंडे का बैज लगा चुके हो तुम भी मत यकीन कर लेना
अपने कमजोर से कमजोर क्षण में भी
तुम यह मत सोचना
कि मेरे दिमाग की मौत हुई होगी!
नहीं, कभी नहीं!
हत्याएं और आत्महत्याएं एक जैसी रख दी गई हैं
इस आधे अंधेरे समय में
फर्क कर लेना साथी!
आलोक धन्वा का कविता-पाठ यहां सुन सकते हैं :
https://www.youtube.com/watch?v=vbcgJlhkzP4&t=466s