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औरत के हुनर से खुद को सुंदर बनाना चाहता है चांद

एक कविता रोज़ में आज पढ़िए अनुज लुगुन की कविता औरत की प्रतीक्षा में चांद.

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29 मई 2016 (अपडेटेड: 29 मई 2016, 08:45 AM IST)
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उस रात आसमान को एकटक ताकते हुए वह ज़मीन पर अपने बच्चों और पति के साथ लेटी हुई थी उसने देखा आसमान स्थिर, शान्त और सूनेपन से भरा था तब वह कुछ सोचकर अपनी चूडियां, बालियां, बिन्दी और थोड़ा-सा काजल उसके बदन पर टांक आई और आसमान पहले से ज़्यादा सुंदर हो गया,

रात के आधे पहर जंगल के बीच जब सब कुछ पसर गया था छोटी-छोटी पहाड़ियों की तलहटी में बसे इस गांव से होकर गुज़रती हवाओं को वह अपने बच्चों और पति के लिए तलाश रही थी उसी समय चांद उसके पास चुपके से आया और बोला-

सुनो ! हज़ार साल से ज़्यादा हो गए एक ही तरह से उठते-बैठते, चलते, खाते-पीते और बतियाते हुए तुम्हारा हुनर मुझे नए तरीके से सुंदर और जीवंत करेगा तुम मुझे तराश दो,

वह औरत अपने बच्चों और पति की ओर देख कर बोली- मैं कुछ देर पहले ही पति के साथ खेत में काम कर लौटी हूं और अभी-अभी अपने बच्चों और पति को सुलाई हूं सब सो रहे हैं अब मुझे घर की पहरेदारी करनी है इसलिए जब मैं खाली हो जाऊंगी तब तुम्हारा काम कर दूंगी अभी तुम जाओ और चांद चला गया उस औरत की प्रतीक्षा में,

चांद आज भी उस औरत की प्रतीक्षा में है.


एक कविता रोज़ में कल आपने पढ़ी कविता- रीवा

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