''तुम ही तनहा मेरे ग़मख़ाने में आ सकती हो.'' यह न्योता भी है और सलाह भी. बार-बार पढ़े जाने पर यह पंक्ति आपके भीतर कुछ बोती है. आप वो चेहरा खोजने लगतेहैं, जिसको इस तरह संबोधित कर सकें. इसे बलरामपुर के शायर अली सरदार जाफरी ने लिखाहै. आज पढ़िए, उनकी दो छोटी नज़्में. साथ ही सुनिए, अली सरदार जाफरी को कुलदीपसरदार की आवाज़ में.--------------------------------------------------------------------------------मेरे दरवाजे सेमेरे दरवाज़े से अब चांद को रुख़सत कर दो साथ आया है तुम्हारे जो तुम्हारे घर सेअपने माथे से हटा दो ये चमकता हुआ ताज फेंक दो जिस्म से किरणों का सुनहरी ज़ेवर तुमही तन्हा मेरे ग़म-खाने में आ सकती हो एक मुद्दत से तुम्हारे ही लिए रखा है मेरेजलते हुए सीने का दहकता हुआ चांद***https://www.youtube.com/watch?v=mgJ_a4YnVo8&feature=youtu.be--------------------------------------------------------------------------------तू मुझे इतने प्यार से मत देखतू मुझे इतने प्यार से मत देख तेरी पलकों के नर्म साये में धूप भी चांदनी सी लगतीहै और मुझे कितनी दूर जाना है रेत है गर्म, पांव के छाले यूँ दमकते हैं जैसे अंगारेप्यार की ये नज़र रहे, न रहे कौन दश्त-ए-वफ़ा में जाता है तेरे दिल को ख़बर रहे नरहे तू मुझे इतने प्यार से मत देख***https://www.youtube.com/watch?v=8m7dGCRKB5s