एक कविता रोज: अधूरा नहीं छोड़ा करते पहला चुंबन
आज पढ़िए गौरव सोलंकी की ये कविता.
फोटो - thelallantop
गौरव सोलंकी IIT रुड़की से पढ़कर इंजीनियर हुए, लेकिन मन किस्सों-कहानियों और कविताओं में रमा रहा. हिंदी के चर्चित युवा कवियों और कहानीकारों में उनकी गिनती होती है. उनकी कविताओं का शिल्प खुरदुरा है और कलेवर तीखा. सोशल टैबूज पर उनका लिखा पढ़ने लायक है. फिलहाल वह मुंबई में अपने लेखन को विस्तार दे रहे हैं. अनुराग कश्यप की फिल्म 'अगली' का गाना 'निचोड़ दे' उन्होंने ही लिखा है. आज उनकी एक कविता:
अधूरा नहीं छोड़ा करते पहला चुंबन
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अधूरा नहीं छोड़ा करते
पहला चुंबन,
जब विद्रोह करती हों,
फड़फड़ाती हों
निर्दोष होठों की बाजुएं
नहीं बना करते अंग्रेज़,
नहीं कुचला करते उनकी इच्छाएं
सन सत्तावन के गदर की तरह.
ऊपर पंखा चलता है.
आओ नीचे हम
रजनीगंधा के फूलों से
छुरियां बनाकर
काट डालें अपने चेहरे,
तुम मेरा
मैं तुम्हारा
या तुम मेरा,
मैं अपना!
सिपाहियों को मिला है आदेश
भीड़ को घेरने का,
बेचारे सिपाहियों ने चला दी हैं
बेचारी छुट्टी भीड़ पर
बेचारी छोटी छोटी गोलियां.
फिर मत कहना कि
अपनी मृत्यु का दिन
मालूम होते हुए भी
मैंने नहीं किया था
तुम्हें सावधान कि
तुम अपना खिलंदड़पना छोड़कर
सोच सको
भावुक होने के विकल्प के बारे में भी.
क्या पता कि
अधूरे छूटे हुए पहले चुंबन
बन जाते हों आखिरी
इसलिए मन न हो, तो भी
अधूरा नहीं छोड़ा करते
किसी का पहला चुंबन.
नब्बे साल बाद सच होते हैं
मंगल पांडे के शाप.
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