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एक कविता रोज: युद्ध के खिलाफ़ एक युद्ध, शांति के लिए

आज पढ़िए विहाग वैभव की एक कविता.

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20 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 21 जुलाई 2016, 05:43 AM IST)
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विहाग वैभव बीएचयू से ग्रेजुएशन करने के बाद हिंदी से एम.ए. कर रहे हैं. कविताएं लिखते हैं, समाज की. खांटी जमीनी और समाज की वीभत्सता को उजागर करतीं. पर एक आशा की किरण पीछे छोड़ जाती, सच्ची कविताएं. मंच पर आते हैं तो माहौल में बारूद की गंध भर जाती है. आज 'एक कविता रोज' में पढ़िए विहाग की कविता -
-युद्ध के खिलाफ युद्ध- किताबों का दूरबीन ले आओ और झांको इतिहास के ग्रह पर तुम पाओगे कि समूचा ग्रह पटा पड़ा है मरे हुए युद्धों से जिसमे सड़ रही है इंसानों की बेहतरीन नस्ल जिसकी तलवारें रो रही हैं खून के आंसू हमने कितनी ही कितनी बार कितने ही कितने लड़े हैं युद्ध युद्ध धर्म के लिए युद्ध देश के लिए युद्ध सम्पत्ति के लिए स्वाभिमान के लिए युद्ध सौन्दर्य के लिए पर ध्यान रहे हजारों हजार युद्ध भी एक शांति से मुकाबला नहीं कर सकते युद्ध नहीं कर सकते कोई सृजन जंग के प्राथमिक संस्करण से पीड़ित यह समय जब कराह रहा है चोटिल आत्मा की आवाज तो आओ हम मुट्ठी भर लोग तय करें एक आखिरी जंग एक जंग अपनी शैतानी रूह के खिलाफ़ एक जंग अपनी अनंत लालसा के खिलाफ़ एक जंग अपनी हवस के खिलाफ़ एक जंग अपनी ईर्ष्या के खिलाफ़ एक जंग अपने बदले के खिलाफ़ आओ लड़ें हम बस एक आखिरी जंग शांति के लिए हमारी दुनिया को शांति की जरूरत है

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