The Lallantop
Advertisement

एक कविता रोज़: 'बंधा सा मैं, एक ओर खुला दरवाज़ा'

एक कविता रोज में आज पढ़िए सुरभि सप्रू की एक कविता.

Advertisement
pic
14 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 14 जुलाई 2016, 01:00 PM IST)
Img The Lallantop
फोटो - thelallantop
Quick AI Highlights
Click here to view more
ये कविता हमें सुरभि सप्रू ने भेजी है. और इस कविता की ख़ास बात ये है कि ये खुद में दो कलाएं समेटे हुए है. पोएट्री और फोटोग्राफी. यानी ये कविता एक खूबसूरत तस्वीर पर लिखी गई है. सुरभि कश्मीर से आती हैं. फ़िलहाल इंडिया टुडे ग्रुप में कंटेंट राइटर हैं. तो अब आप तस्वीर देखिए. और पढ़िए उनकी कविता.


 

Delhi
Photo: Vivan Mehra

बंधा सा मैं एक ओर खुला दरवाज़ा इस ओर बंधा सा मैं बुलाती धूल उस ओर की इधर धुंधली निगाहों से भीगा मैं
तरसती भोर में बह जाती है जीवन की होड़ रास्ते मिल जाते हैं मिल जाए कोई मोड़
बहुत दूर चला जाता हूं फिर लौट आता हूं मैं जाकर भी वहां पहुँच नहीं पाता हूँ
बड़ी देर बाद खुला है उम्मीदों का जहाँ सोच रहा हूँ कैसे जाऊं मैं वहां
जहाँ रहता हूँ वहां अपने मेरे बसते है मेरे सपने बड़े सस्ते है मैं बिक जाऊं हो जाऊं न उस जहाँ का मेरे सपनों से मेरे अपने ही अच्छे है



अगर आप भी कविता/कहानी लिखते हैं, और चाहते हैं हम उसे छापें, तो अपनी कविता/कहानी टाइप करिए, और फटाफट भेज दीजिए lallantopmail@gmail.com पर. हमें पसंद आई, तो छापेंगे.
और हां, और कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने ‘एक कविता रोज़’ टैग पर क्लिक करिए.

Advertisement

Advertisement

()