बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में शोध छात्र रहे युवा कवि रविशंकरउपाध्याय का 19 मई 2014 को बी.एच.यू. के एक अस्पताल में 30 वर्ष की अवस्था में हीब्रेन हैमरेज से निधन हो गया था. रविशंकर छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय थे औरबी.एच.यू. में 'युवा कवि संगम' जैसे आयोजन के संस्थापकों में थे. उनकी सक्रियता आजभी स्मरणीय बनी हुई है. उनका पहला कविता-संग्रह 'उम्मीद अब भी बाकी है' नाम से उनकीमृत्यु के बाद वर्ष 2015 प्रकाशित हुआ. आज रविशंकर की जन्मतिथि है. इस अवसर परउन्हें याद करते हुए आज एक कविता रोज़ में प्रस्तुत है उनकी एक कविता... उम्मीद अब भी बाकी है जब धुंधली होने लगती है उम्मीद की किरण जब टूटने लगता है आशाऔर विश्वास तभी प्रकृति की अनंत दुनिया में से आती है आश्वासन की एक आवाज जोधीरे-धीरे भर देती है एक ललक जीवन की उद्दाम आकांक्षाओं की भय और विश्वास के बीचजीतता सदैव विश्वास ही है भले ही सीता को हर ले जाए रावण भले ही भिक्षा में मांग लेजाए इंद्र कवच-कुंडल भले ही कारागार में डाल दिए जाय देवकी और वासुदेव भले हीअनसुनी कर दी जाए नागासाकी और हिरोशिमा से उठती कराह... भले ही मिट्टी में मिला दीजाए करुणा और शांति की आदमकद प्रतिमाएं भले ही बार-बार प्रहार करें मनुष्यता केदुश्मन बनारस और लाहौर पर भले ही न बख्शा जाए घंटे की ध्वनि और अजान की आवाज भले हीन बख्शी जाए गंगा और जमुना की अजस्र धारा भले ही न छोड़ी जाए कोयल की कोकिल कंठी तानसे मुलायम हो रही डाल भले ही उजाड़ दिए जाएं चिड़ियों के घोंसले अपने वजूद और अपनीमिट्टी से जुड़े लोगों को उनकी आदिम आकांक्षाएं बचा ही लेंगी जब तक बची रहेगीपृथ्वी!