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'बादलों ने खींचकर कान तक छोड़ दिए सबसे ख़तरनाक तीर'

एक कविता रोज: आज पढ़िए पराग पावन की कविता.

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21 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 21 जुलाई 2016, 03:19 PM IST)
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पराग पावन ने बीएचयू से ग्रेजुएट हैं. और अब जेएनयू से एम. ए. कर रहे हैं. कविताएं लिखने का शौक रखते हैं. 'एक कविता रोज' में पढ़िए आज इनकी लिखी एक दमदार कविता.
बादलों ने खींचकर कान तक छोड़ दिए सबसे ख़तरनाक तीर तरकश के अपने. तिरछे हैं, बरछे हैं घुसते हैं देह में जमीन के मई जून होता तो कड़ी मिट्टियों के कवच ओढ़ लेती धरती माँग के बीन के पर हाय रे! देह नंगी गीली है मिट्टी की घाव है नम बहते ही जाते हैं मटमैले लहू छल छल छुल छुल मड़ाई के गेहूँ आज लथपथ है खून से सुबकता है घर भर कि तवे की दुलहन की मौत है. अबकी चढ़ेगा घोड़ी तो कैसे अबकी बजेगी घरवाली-हाथों चढ़ी चूड़ी तो कैसे दूल्हा और दुलहन के आस पास रेवंछेगी छुटकी भी कैसे. अबकी सब ठण्ढा है सबही उदास है पाना था हीरा जब पाए तब घास है ठालों के मद्देनज़र इशारों पर बारिश के भुल्लन नट बदलेगा कुछ खेल सरकश के अपने. बादलों ने खींचकर कान तक छोड़ दिए सबसे ख़तरनाक तीर तरकश के अपने.

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