'नींद से लंबी रात' और 'हर घर से गायब' जैसे दो कविता-संग्रह हिंदी को देने वालेनवीन सागर (1948 - 2000) को अक्सर कवियों की लिस्ट से बाहर रखा जाता है. एक बेहदचालू मुहावरे में कहें तो वह एक भुला दिए गए कवि हैं. आज दो अप्रैल है. नवीन सागरने इस तारीख को केंद्र में रख कर एक कविता रची है. आज पढ़िए एक कविता रोज़ में यहीकविता... दो अप्रैल को जन्मे सब कुछ के लिए प्रार्थनाजिस दिन को हम दो अप्रैल कहते हैं वह तमाम दिनों में से इस कदर बिना चुने दो अप्रैलहै कि हर दिन दो अप्रैल होने को स्वतंत्र है और हम इतना कम जानते हैं रहस्यों भरेसंसार को कि अचरज नहीं अगर पूरा काल एक दिन है जिसे तारीख दो अप्रैल कहते हैं बाकीतीन सौ चौंसठ तारीखों की प्रार्थना इसी प्रार्थना में समाहित है कि जैसे काल समूचाएक पल में सन्निहित हम फैलते हुए आयतन में घनत्व की चेतना हम अनंत की लघुता मेंशून्य हम नि:शब्द संसार में निस्सीम शब्दों की प्रार्थना हैं हम अपने बारे में इतनाकम और इतना अधिक जानते हैं कि प्रेम ही बचता है प्रार्थना की राख में अकेली एक लहरपूरे समुद्र की जगह बचती है जब हम भूल जाते हैं जीना अनंत अपनी मृत्यु में रहते हैंइतने धुंधले कि हमारी झलक में बार-बार जन्म लेते हैं संसार सारे जन्मों में हमींजन्म लेकर जन्मों की प्रार्थना गाते हैं हमीं जाते हैं हमीं रह जाते हैं आज दोअप्रैल है और मुझे लग रहा है इसके अलावा आज कुछ नहीं है आज के दिन जो कुछ भी जन्माहै उसकी प्रार्थना ही आज का दिन है धरती घूम रही है फूलों से लदी आसमान में बधावेबज रहे हैं ***