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एक कविता रोज़: चांद नहाने उतरेगा, फिक्र नदी में ढलने दो

श्रम में उलझे हाथ हैं, बेड़ी में हैं पांव, सपना बनकर रह गया, वह सपनों सा गांव

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16 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 16 जुलाई 2016, 12:30 PM IST)
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राकेश कुमार दीपू वैसे हैं तो बिहार से पर अब दिल्ली ही ठिकाना है. तैयारी कर रहे हैं आईएएस बनने की. कविताओं से बेहद लगाव है. हिंदुस्तानी और अंग्रेजी की कविताओं में अच्छी घुसपैठ है. खुद भी लिखते हैं पर गाहे-बगाहे. बड़ी से बड़ी बात तीन लाइन के हाइकू में कह जाने के लिए जाने जाते हैं. पर और भी कई विधाओं में कलम चलाई है. पढ़िए आज एक कविता रोज़ में उनकी कविताएं -

चांद नहाने उतरेगा

आस नयन में पलने दो गीत-गज़ल में ढलने दो रौशन होगा ख्वाब नगर दर पर दीपक जलने दो हिय का पीर पिघलने दो आखर अरथ निकलने दो चांद     नहाने      उतरेगा फिक्र  नदी  में  ढलने  दो

पांच हाइकू -

1. याद दिलाएं सुख-दुःख के मोड़ बिछुड़े मीत 2. अरुझि गुड्डी छूटती न टूटती मांझे सी आस 3. बंधती गांठ आहत भाव इक छूटते हाथ 4. पुकारे गांव निज सखा स्वजन चल रे मन 5. काल पड़ा है परदेश नियति मत रोको री

दो दोहे-

1. श्रम  में  उलझे   हाथ  हैं,  बेड़ी   में  हैं  पांव सपना बनकर रह गया, वह सपनों सा गांव 2. होरी  बैठा  मेढ़ पर, कोसे  अपने  भाग पानी बस है आंख में, सूखे ताल तड़ाग
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