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एक कविता रोज: दूध का दांत आधा तुड़वाए, आधा बचाए, बच्चा

एक कविता रोज में आज पढ़िए अंकित दुबे की कविता.

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22 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 22 जुलाई 2016, 03:54 PM IST)
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अंकित दुबे जेएनयू में हिंदी से एम. ए. कर रहे हैं. फक्कड़ हैं. मन लगा तो जम गए. मन हटा तो उखड़ गए. संवेदनशील हैं. कविताएं लिखते हैं. आज 'एक कविता रोज' में पढ़िए भारत में गरीबी के बचपन पर असर को दिखाती उनकी ये दिल छू लेने वाली कविता -
गुलाम भारत नहीं इलाहबाद का पथ भी नहीं और ना हीं महाकवि निराला हैं न प्रौढ़ महिला है और ना हीं हथौड़ा पास में तरुमालिका अट्टालिका भी नहीं
तो क्या है ? ऑड-इवन और विकास पर्व वाली आज की आज़ाद दिल्ली है कहीं पहुँचने की बेताबी में मैं हूँ और दो जून की गर्म साँझ है नन्हा सा एक दरख़्त है और बग़ल में डीडीए के कम ऊँचे फ्लैट्स सामने कुछ दूधिया दाने वाले भुट्टे हैं और दूध का दाँत आधा तुड़वाए आधा बचाए बच्चा है जो दो जून की रोटी ख़ातिर बेजान स्याह टुकड़ों में फूँक मारता है जान फूँकता है

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