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एक कविता रोज: 'फिर ये बारिश मेरी तनहाई चुराने आई'

बारिश के मौसम में पढ़िए कैफ भोपाली के ये सुंदर ग़ज़ल.

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19 जुलाई 2016 (अपडेटेड: 19 जुलाई 2016, 11:44 AM IST)
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'चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो.' ऐसे गीत लिखने वाले, अपने समय के पॉपुलर गीतकार और शायर थे कैफ भोपाली. आज पढ़िए इनकी एक ग़ज़ल, 'एक कविता रोज' में.
 
दर ओ दीवार पे शक्लें सी बनाने आई फिर ये बारिश मेरी तनहाई चुराने आई ज़िंदगी बाप की मानिंद सजा देती है रहम-दिल मां की तरह मौत बचाने आई आज कल फिर दिल-ए-बर्बाद की बातें हैं वही हम तो समझे थे के कुछ अक्ल ठिकाने आई दिल में आहट सी हुई रूह में दस्तक गूंजी किस की खुशबू ये मुझे मेरे सिरहाने आई मैं ने जब पहले-पहल अपना वतन छोड़ा था दूर तक मुझ को इक आवाज़ बुलाने आई तेरी मानिंद तेरी याद भी ज़ालिक निकली जब भी आई है मेरा दिल ही दुखाने आई

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