पिछले पांच-छः वर्षों से ब्लॉगिंग सोशल मीडिया एवं अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स मेंअपर्णा श्रीवास्तव 'अनेकवर्णा' की कविताएं खूब सराही जाती रही हैं. हिंदी औरअंग्रेज़ी दोनों में लिखती और अनुवाद करती हैं. इन दिनों इनकी रचनाएं विभिन्नपत्र-पत्रिकाओं, संग्रहों और साहित्यिक ब्लॉगों में नियमित रूप से प्रकाशित हो रहीहैं. होने को तो एक कविता रोज़ में रस्म है कि हम आपको 'एक' कविता रोज़ पढ़वाते हैं.लेकिन लेखिका का नाम 'अनेकवर्णा' है, यानी कई रंग, रंगों का पूरा स्पेक्ट्रम. तोइसलिए ही आज आपको इनकी सात कविताएं पढ़वा रहे हैं.--------------------------------------------------------------------------------# 1) शमशान-वैराग्य आलता-लाल एक जोड़ी घिसे पांव निकल पड़े हैं आदिम दिशा को कर आईविदा जिन्हें बस कल ही वो पलटे नहीं न ठिठके न ही बदली दिशा अपनी पुकारता रहा आकाशबरसता रहा जल खूब धधकी अग्नि चंदन पहने डोलती रही पवन धरती ने फिर किया वहन एक औरवियोग का भार अपने आदिम धैर्य से संकोच ने रुंधन को जड़ दिया था ग्रंथियों में हीदुबकी रही वह महानगर की थमी विथिकाओं से उभरी संवेदना जुटी और फिर वहीं लौट गईंअसहाय सी एक दूसरे से आंखें चुराए लौटती मेरी देह से झूलता रहा चिरायंध चटकता रहाकानों में बंधनों का खुलते जाना मन में बिखरा रहा कुछ देर शमशान-वैराग्य फिर कपूरसा उड़ गया बस एक चिन्ह से स्मृति में रुके हुए हैं आलता से लाल एक जोड़ी घिसेपांव.--------------------------------------------------------------------------------# 2) उमस फ़्रीडा की चिर रोगशय्या और फीतों वाली कसी पोशाक के बीच कहीं से उसकेपकते-सूखते घावों और आइने से चित्रों के रास्ते वर्षावनों के किसी प्रौढ़ बारहसिंगेसी ठिठक ठिठक कर बढ़ती आती है उमस मीज़ो बांसवनों के उष्ण-कटिबंधीयता में उभरती बजउठती है रह-रहकर झींगुर की तमाम पीढ़ीयों में उनके गुणसूत्रों में पिरोई कड़ियांबनकर हुगली-जल पर बहती, डूबती, उतराती उमड़ आती है घाट की सीढ़ियों पर कालीपद केजवा पुष्प सरका कर, तनिक सुस्ताती है दर्शन को आई नववधु का सिंदूर पसीज कर नाक कीनोंक तक जा बहता है सबसे लाल जवा-पुष्प वही है भाप के नख से कुरेदती है लाल माटी,संथाल वनांतर की पुचकार पुकारती है बीज में सोए शिशु वनों को हंड़िया, महुआ,सघा-साकवा, बांसुरी, मांदर के तिलिस्म के बीच हुलसती है ममत्व से, छलक जाती है हमनेभी तो बालों में, सीने पर और कान के पीछे पहन लिया है उसे गहनों की तरह उमस हमारीसाधी हुई दूरियों में रेंगती है व्यक्त होने की कगार से लौट-लौट सर पटक कर केशबिखराए हारी-थकी, बीच में आ पसरती है.--------------------------------------------------------------------------------# 3) आस-पास ऊंघता हुआ पत्थर नदी के अंदर देखता है स्वप्न एक पतंगा है वो... उड़नेकी ललक जाग जाती है... मछली पानी के सतह पर चमकते धूप के गुनगुने सिक्कों को बटोरलेती है सांसों में.. दो-एक हो फरार बनकर बुलबुले वापस सतह पर लौट जाते हैं.. पेड़कहीं नहीं जाते पर उनके साए सारे दिन रेंगते हैं... खूंटी से बंधे-बंधे अपना आस-पासटटोलते रहते हैं... कछुवे की आंखों के खारे दुःख पी जाती हैं तितलियां... नशे मेंरंगीन हो जाती हैं... कछुवों का क्या है... यूं रीत कर वापिस अपने खोल में नए अवसादरोप लेते हैं ड्रैगनफ्लाई की कंपाउंड आंखें ऐसा क्या दिखा देती हैं उसे वो तो एकधागा लिए आते नन्ही आहटें नहीं भांप पाता है अपने इन्द्रधनुषी परों को निहारता रहताहोगा कमबख्त सत्तर के दशक की तमाम रातें और मेहंदी की फेंस एक पुल बंध जाता थाहमारे कच्चे-सच्चे रूमान तक वहां हम जुगनू पकड़ 'ग्राइप-वाटर' की खाली बोतलों में एकठंडी सफ़ेद रौशनी बटोरते थे ढक्कनों में ज़रूर होती थीं उम्मीद भरी सुराखें.--------------------------------------------------------------------------------# 4) मधुमेह सुना उसने तो उसने कहा 'लगता है मिठास बढ़ गयी है' मैंने कहा 'हां, जोबाद में मुंह कड़वा कर देती है.' दिन अब नए सलीके से बंटता है छः कतरे हुए छोटे भागहैं भोजन के तीन जून की रोटी' अब बीती हुई बात है पार्क के गिर्द घूमते-घूमते फिरसे मिलते हैं पग त्वरा से देह लय से रोम स्वेद से सांस हवा और हवा सांस से स्मृतिनीम-मंजरी से पंडुकी, धनेश से... चैत मास से मैं खुद से और मन भारहीनता से...इंजेक्शन की सुई भेदती है नस खींच ले जाती थोड़ा सा खून छोड़ जाती है थोडा अवसादमुझमें थोड़ी आशंका पति में थोड़ी तरस कम्पाउण्डर की आंखों में.--------------------------------------------------------------------------------# 5) इन दिनों नहीं पीती सिगरेट तब भी पैसिव स्मोकिंग तो करवा ही देते हो सिगरेटतुम्हारी उंगलियों से उलझी सुलगती रहती है जलन से... मुंह... कम ही लगती है इनदिनों.. 'लिजलिजे' शब्द वर्जित हैं हमारे संवाद में जो अक्सर एकतरफा होते हैं...मैं इस डर से 'गैर-लिजलिजा' बोलती रहती हूं कहीं बीच का चुप इतना लम्बा न हो जाए किउसे भरने से पहले ये सोचने लगूं,'इज़ इट वर्थ इट?' मुझे पढ़ते रहना है तुम्हारे मौनमें तुम्हारे अनकहे में तुम्हारे 'सहज' में अपने लिए भीना सा कुछ सुकोमल... तुम कुछकह भी दो तो दूसरे ही पल 'व्यक्त' की ग्लानि से भर उठते हो मैं बीतते जाने के भय सेकितने सावधानी से 'पसेसिव' होते हो कहीं मुझे पता न चले और मैं... अपनी पुलक छुपायेचुपके से 'टच-वुड' करती हूं.--------------------------------------------------------------------------------# 6) एक बार फिर उफ़ उमस इतनी कि सांसें गाढ़ी हो गई कितनी लगता है पैरों से जड़ेंऔर बाहों से शाखाएं फूट पड़ेंगी अभी कि बस नमक ही देह का सत्य है कि सारा आस-पासवाष्प ही रहा सदा से कि मैं मार्क्वेज़ के किसी उपन्यास में क़ैद हूं जिसके कवर परजड़ी हैं मेरी दो आकुल तश्तरी-आंखें और भीतरी पन्नों में कंपन है मैना कीधौंकनी-कंठ की.--------------------------------------------------------------------------------# 7) गिरना गिरना गिरने से बहुत पहले शुरु हो जाता है जब जड़ें छोड़ने लगती हैंमिट्टी का हाथ खोने लगती हैं भरोसा धरती पर.--------------------------------------------------------------------------------एक कविता रोज़ के अन्य संस्करण भी पढ़ें: 'इस तरह भूल जाएं बीते साल भर की मुश्किलें''मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मज़दूरहूं' 'बड़े लोग इसी काम के लिए बेदांता नाम के हस्पताल में जाते हैं' 'किन पहाड़ोंसे आ रहा है ये किस समंदर को जा रहा है, ये वक़्त क्या है?' 'पंच बना बैठा है घरमें फूट डालने वाला' 'सुनो परम ! पैदल चलना, हाथ से लिखना और सादा पानी पीना...''बंधे हों हाथ और पांव तो 'आकाश' हो जाती है उड़ने की ताक़त' 'अगर बचा रहा तोकृतज्ञतर लौटूंगा' 'तीन आलू सरककर गिर गए हैं किसी के' 'मेरे लिए दिल्ली छोड़ने केटिकट का चन्दा इकट्ठा करें' 'दिल्ली में रोशनी, शेष भारत में अंधियाला है'--------------------------------------------------------------------------------VIDEO देखें:'कुछ बन जाते हैं':