नज़्म ने आंखों के सामने वो मंज़र खींचा है, कि दी लल्लनटॉप के पाठकों से निवेदन हैकि इसे पढ़ते वक्त अपने विवेक से काम लें और कमज़ोर दिल वाले न पढ़ें. नज़्म का उन्वानयानी शीर्षक है हस्सास यानी इमोशनल और लेखक का नाम है सिराज फैज़ल खान:--------------------------------------------------------------------------------हस्सासआख़िर वो किसकी ग़लती थी उस बूढ़े की कंडक्टर की या फिर उस बस के ड्राइवर की जिसकी भीहो लेकिन उसमें मेरा तो कोई दोष नहीं थामैं तो बाक़ी सब लोगों की तरह मुसाफ़िर था उस बस का जिसके नीचे कहीं अचानक से वो बूढ़ाआ जाता हैउसको बस के नीचे आते भी तो न देखा था मैंने वो तो बस के ब्रेक से मेरी नींद खुली औरशोर समाअत से टकराया तब खिड़की से झांका था मैं इधर उधर बिखरी सब्ज़ी के इर्द गिर्दवो धार लहू की सांप सरीखा रेंग रही थी और गले में शायद उसके चीख कहीं पर फंसी हुईथीउस मंज़र में सीट से अपनी हिल तक न पाया था मैं तोहिल कर भी अब होना क्या था? आख़िर मैं कर क्या सकता था? फिर क्यों मुझको नींद नहींआती उस दिन से खाना खाने बैठता हूं तो उस बूढ़े का कर्बनाक वो लहू उगलने वाला चेहरासामने मेरे आ जाता है और फिर उसके बाद निवाला मिरे गले से उल्टी बन बाहर आता हैऔर मांस को फाड़ के बाहर निकली उस बूढ़े की हड्डी मेरे दिल में धंस जाती हैक्यों नाकरदा जुर्म का ये एहसास मेरे अंदर बैठा है? क्या उसको मैंने मारा है? उसकीमौत मेरी ग़लती है? थोड़ा भी हस्सास नहीं होता है कोई लोगों को एहसास नहीं होता हैकोई मुझसे सब बस यह कहते हैं लोग तो मरते ही रहते हैं कौन भला परवा करता है? तुम हीख़ुद को क़ैद किये हो उस मंज़र में, उस मंज़र से बाहर आओ मिट्टी डालो धुंआ उड़ाओ लेकिनमैं कैसे समझाऊं के उसका आसेब मेरे ख्वाबों में आकर रोज़ यही कहता रहता है'मुझ पर ये एहसां करवा दो घर पर मेरे बीवी बच्चे भूखे होंगे उन तक वो सब्ज़ी भिजवादो...'--------------------------------------------------------------------------------लल्लनटॉप में पढ़िए एक कविता रोज़:‘मेरी मां मुझे अपने गर्भ में पालते हुए मज़दूरी करती थी, मैं तब से ही एक मज़दूरहूं’ बड़े लोग इसी काम के लिए बेदांता नाम के हस्पताल में जाते हैं किन पहाड़ों सेआ रहा है ये किस समन्दर को जा रहा है, ये वक़्त क्या है? ‘पंच बना बैठा है घर मेंफूट डालने वाला’ पाब्लो नेरुदा की कविता का अनुवाद: अगर तू मुझे भूल जाए एक कवितारोज़: इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो सुनो परम ! पैदल चलना, हाथ से लिखना औरसादा पानी पीना…--------------------------------------------------------------------------------VIDEO देखें:कुंवर नारायण की कविता ‘बात सीधी थी, पर…’