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1934 FIFA वर्ल्ड की कहानी, जब मुसोलिनी ने FIFA को जूते के नीचे रखा था!

1934 वर्ल्ड कप इटली में हुआ था. इटली पर फासीवादी तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी का शासन था. आरोप लगे कि रेफरियों पर दबाव डाला गया. कई विवादित फैसले इटली के पक्ष में गए.

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26 जून 2026 (अपडेटेड: 25 जून 2026, 02:01 AM IST)
Italy FIFA World Cup 1934
इटली ने 1934 में अपने घर पर जीता था वर्ल्ड कप. (फोटो-AFP)
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'फीफा' शब्द फ्रेंच भाषा से आया. पूरा नाम फेडरेशन इंटरनेशनेल डी फुटबॉल एसोसिएशन. ये एक ऐसी संस्था है, जो दुनियाभर में फुटबॉल से जुड़े मसले संभालती है. बिल्कुल क्रिकेट के ICC की तरह. पहला वर्ल्ड कप 1930 में दक्षिण अमरीकी देश उरुग्वे में खेला गया. लेकिन आज की कहानी उस वर्ल्ड कप की नहीं है.

कहानी शुरू होती है चार साल बाद. 1934 में. उस समय पूरा यूरोप बेचैन था. जर्मनी में हिटलर तेज़ी से अपनी पकड़ मज़बूत कर रहा था. 1929 के 'ग्रेट डिप्रेशन' ने दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ दी थी. 

ठीक इसी माहौल में इटली पर राज कर रहा था बेनिटो मुसोलिनी (Benito Mussolini). एक तानाशाह. फासीवाद का चेहरा. ऐसा इसलिए क्योंकि मुसोलिनी सारी शक्तियां अपनी मुट्ठी में रखता था. आलोचना बर्दाश्त नहीं करता था.

ग्रीस ने नाम वापस क्यों ले लिया?

एक टाइम तो ऐसा भी आया, जब वो इटली को नए रोमन एम्पायर में बदलना चाहता था. और खुद को ‘नया रोमन सम्राट’ समझने लगा था. इसी मुसोलिनी का सपना था कि 1934 का वर्ल्ड कप इटली में हो. और इटली जीते भी. ताकि दुनिया उसकी ताकत देखे. मुसोलिनी का ये सपना आसान नहीं था. इस सपने को पूरा करने के लिए इटली ने सिर्फ मैदान में खेल नहीं खेला. मैदान के बाहर भी, कई खेल खेले गए.

मेज़बान होने के बावजूद इटली को क्वालीफाई करना था. उसका मुकाबला ग्रीस से हुआ. पहला मैच इटली ने 4-0 से जीता. दूसरा मैच होने से पहले ही ग्रीस ने नाम वापस ले लिया. उस समय लोगों ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. लेकिन करीब 60 साल बाद कुछ रिपोर्ट्स सामने आईं. दावा किया गया कि इटली ने ग्रीस को रिश्वत दी थी. ग्रीक फुटबॉल संघ आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. कथित तौर पर इटली ने एथेंस में एक संपत्ति खरीद कर उन्हें दे दी. ये आरोप कभी पूरी तरह साबित नहीं हो सका.  

Fifa 1934 World Cup
चैंपियन बनने के बाद इटली की टीम. (फोटो-AFP)
नागरिकता नहीं थी, फिर भी खेले?

एक और विवाद था ‘ओरिउंडी स्कैंडल’. इटली की 23 खिलाड़ियों की टीम में लगभग 7 प्लेयर्स ऐसे थे, जिनके पास इटली की नागरिकता नहीं थी. इन्हें ही ओरिउंडी कहा जाता था. इनमे कुछ प्लेयर्स अर्जेंटीना में, कुछ ब्राज़ील में जन्मे थे. ऐसे खिलाड़ियों में सबसे बड़ा नाम था लुईस मॉन्टी का. चार साल पहले 1930 वर्ल्ड कप में वो अर्जेंटीना का सितारा था. अब वही इटली की जर्सी पहने खेल रहा था.

एक खिलाड़ी, दो देशों के लिए वर्ल्ड कप फाइनल खेले ऐसा पहली बार हुआ था. 27 मई 1934. वर्ल्ड कप शुरू हुआ. सिर्फ 16 टीमें. कोई ग्रुप स्टेज नहीं. एक मैच हारो और सीधे घर जाओ. इटली ने शुरुआत शानदार अंदाज़ में की. रोम में खेले गए अपने पहले मैच में उसने अमेरिका को 7-1 से हरा दिया.

स्टेडियम में बैठे हजारों लोग खुशी से झूम उठे. चारों तरफ फासीवादी सलाम के पोस्टर लगा दिए गए. ऐसा लग रहा था जैसे ये सिर्फ फुटबॉल मैच नहीं, बल्कि जंग जीती हो. अर्जेंटीना भी पहले ही राउंड में बाहर हो गया. ब्राज़ील के साथ भी यही हुआ. स्पेन भी शुरुआती मैचों में ही बाहर हो गया.

ये भी पढ़ें : 2022 के मुकाबले दोगुनी हुई फीफा वर्ल्ड कप ट्रॉफी की कीमत

रेफरी को मुसोलिनी ने डिनर पर क्यों बुलाया?

धीरे-धीरे इटली सेमीफाइनल तक पहुंचा. यहां से गेम एक लेवल अप हो गया था. वजह थी ऑस्ट्रिया की टीम. ये टीम मुसोलिनी के सपने में सबसे बड़ा रोड़ा थी. यहीं शुरू हुआ एक ऐसा विवाद, जो फीफा वर्ल्ड कप के इतिहास में काले दिनों में गिना जाता है.

मैच शुरू होने से पहले ही कुछ ऐसा हुआ, जिसने कई लोगों को हैरान कर दिया. कई पत्रकारों और इतिहासकारों का दावा है कि मैच से ठीक एक शाम पहले मुसोलिनी ने मैच के रेफरी इवान एकलिंड को अपने महल में डिनर पर इनवाइट किया. भाई साहब पहुंच भी गए.  

उस डिनर में क्या बात हुई, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है. किसी को नहीं पता कि उस रात मेज पर इटैलियन खाने के साथ क्या क्या था? लेकिन अगले दिन मैदान पर जो हुआ, उसने काफी कुछ साफ़ कर दिया. मैच शुरू होने से पहले ही शायद सेमीफइनल की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी थी. उसी डिनर में.

FIFA 1934 world cup
गोल करने के बाद जश्न मनाते इटली के प्लेयर्स. (फोटो-Getty Images)
रेफरी के कई फैसले रहे विवादास्पद

साथ ही बारिश की वजह से मैदान कीचड़ से भर चुका था. यही ऑस्ट्रिया के लिए बुरी खबर थी. क्योंकि उनकी ताकत क्विक पासिंग थी. ऐसे मैदान में वो खेल आसानी से नहीं खेला जा सकता था.

मैच शुरू हुआ. और सिर्फ पांच मिनट बाद ही पहला विवाद सामने आ गया. इटली के खिलाड़ी लुईस मॉन्टी (Luis Monti) ने ऑस्ट्रिया के सिंडेलार  को पेनाल्टी बॉक्स के अंदर गिरा दिया. ऑस्ट्रिया को पूरा भरोसा था कि ये साफ पेनाल्टी है. लेकिन, रेफरी ने खेल जारी रहने दिया. कोई सीटी नहीं बजी.

ऑस्ट्रियाई खिलाड़ी हैरान रह गए. उस समय VAR वाला रूल भी नहीं था. VAR को क्रिकेट के रिव्यू की तरह ही समझिए. फिर 19वें मिनट में एक और विवाद हुआ. इटली ने गोल कर दिया. लेकिन ऑस्ट्रिया के खिलाड़ियों का दावा था कि उनके गोलकीपर ने गेंद को पहले ही पकड़ लिया था. इसके बाद इटली के खिलाड़ियों की टक्कर से गेंद छूट गई और गोल हो गया. ऑस्ट्रिया ने विरोध किया. लेकिन रेफरी ने गोल मान लिया. स्कोर- इटली 1, ऑस्ट्रिया 0.

यही गोल बाद में मैच का फैसला भी बना. मैच के दौरान एक और अजीब आरोप लगाया गया. कुछ लोगों का कहना था कि एक मौके पर रेफरी खुद गेंद के रास्ते में आ गए और ऑस्ट्रिया के एक अटैक को रोक दिया. फिर एंड टाइम की सीटी बजी. इटली 1-0 से जीत चुका था. वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंच गया.

FIFA 1934 world cup
1934 फीफा वर्ल्ड कप के दौरान खेलते प्लेयर्स. (फोटो-Getty Images)
विवाद के बावजूद फाइनल में इवान ही रहे रेफरी

मैच खत्म होने के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुए. मीडिया ने रेफरी इवान एकलिंड को खूब उधेड़ा. लेकिन इसी रेफरी को वर्ल्ड कप फाइनल का रेफरी भी बना दिया गया. अब आलोचकों को लगा कि मामला और भी संदिग्ध हो गया है. उधर, दूसरे सेमीफाइनल में चेकोस्लोवाकिया ने जर्मनी को हराकर फाइनल में जगह बना ली.

एक बात साफ थी. अब फाइनल सिर्फ फुटबॉल का मैच नहीं रह गया था. उस पर राजनीति, शक्ति और शक की एक लंबी परछाई पड़ चुकी थी. उस परछाई के बीच मुसोलिनी अपने सबसे बड़े पल का इंतजार कर रहा था. 10 जून 1934. फाइनल मैच. आखिरकार वो दिन आ ही गया, जिसका मुसोलिनी महीनों से इंतजार कर रहा था.

रोम का फुटबॉल स्टेडियम दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था. रिकॉर्डतोड़ गर्मी के बावजूद करीब 55 हजार लोग इटली को वर्ल्ड चैंपियन बनते देखने आए. स्टैंड्स में मुसोलिनी खुद मौजूद था. उसके आसपास फासीवादी अधिकारियों की पूरी टोली बैठी थी. मैच शुरू हुआ. मैदान के बीचों-बीच खड़ा था वही रेफरी… इवान एकलिंड.

चेकोस्लोवाकिया ने दागा पहला गोल

1934 के वर्ल्ड कप में चेकोस्लोवाकिया कोई कमजोर टीम नहीं थी. उनकी पासिंग शानदार थी. मैच में कड़ी टक्कर की उम्मीद थी. समय बीतता गया. एक भी गोल नहीं हुआ था. फिर आया 70वां मिनट. चेकोस्लोवाकिया के खिलाड़ी एंटोनिन पुच (Antonin Puc) ने शानदार गोल दाग दिया. स्कोर हो गया 1-0. पूरे स्टेडियम में सन्नाटा पसरा था.

मुसोलिनी के एक्सप्रेशन भी बदले-बदले नज़र आ रहे थे. सपना टूटता दिखाई दे रहा था. इसी बीच रेफरी के कुछ फैसलों पर भी सवाल उठने लगे. दावा किया गया कि चेकोस्लोवाकिया को दो पेनाल्टी नहीं मिलीं. कुछ लोगों ने ये भी आरोप लगाया कि इटली के खिलाड़ियों की कई एग्रेसिव गेम को नजरअंदाज कर दिया गया. इन दावों पर आज भी बहस होती है. लेकिन उस समय चेकोस्लोवाकिया के खिलाड़ियों और अधिकारियों में नाराजगी जरूर थी.

FIFA 1934 World Cup
फाइनल मुकाबले से पहले चैंपियन इटली की टीम. (फोटो-Getty Images)
राइमुंडो और एंजेलो ने पलट दिया मैच

फिर आया मैच का सबसे बड़ा मोमेंट. इटली को वापसी करने का मौका मिल गया. खेल खत्म होने में सिर्फ 10 मिनट बचे थे. तभी इटैलियन खिलाड़ी राइमुंडो ऑर्सी (Raimundo Orsi) ने एक ऐसा गोल किया, जिसे देखकर पूरा स्टेडियम उछल पड़ा. गेंद एक अजीब से एंगेल से मुड़ी और गोलकीपर को छकाते हुए. गोल पोस्ट में चली गई. स्कोर 1-1 हो गया. फुल टाइम होने के बाद कोई रिजल्ट नहीं आया. मैच अब एक्स्ट्रा टाइम में पहुंच चुका था. खिलाड़ी थक चुके थे.

फिर 95वें मिनट में वो हुआ जिसका इंतजार पूरा इटली कर रहा था. इटैलियन खिलाड़ी एंजेलो स्कियावियो (Angelo Schiavio) ने दूसरा गोल दाग दिया. स्कोर अब 2-1 का हो गया था. इटली आगे था. कुछ मिनट बाद फ़ाइनल सीटी बजी. मैदान में जश्न फूट पड़ा. 

इटली की जीत थी या मुसोलिनी की? 

इटली वर्ल्ड चैंपियन बन चुका था. मुसोलिनी का सपना पूरा हो गया था. मुसोलिनी को वो जीत मिल गई थी जिसकी उसे तलाश थी. अगले दिन फासीवादी अखबारों ने इसे सिर्फ खेल की जीत नहीं बताया. बल्कि कहा कि ये इटली की ताकत की जीत है. ये फासीवाद की जीत है.

मुसोलिनी जश्न मना रहा था. लेकिन सभी ऐसा नहीं सोच रहे थे. कई लोगों के मन में अब भी वही सवाल घूम रहा था. क्या इटली सचमुच सबसे अच्छी टीम थी? या इस जीत के पीछे सिर्फ फुटबॉल नहीं, कुछ और भी काम कर रहा था?

वीडियो: कौन हैं फीफा वर्ल्ड कप 2026 के ओपनिंग मैच में 3 रेड कार्ड दिखाने वाले रेफरी विल्टन सम्पायो?

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