अंग्रेज़ों के जाने के बाद भारत ने बहुत सारी चीज़ें ठीक हैं. सड़कों-गलियोंचौराहों के नाम बदले हैं. धीरे-धीरे ही सही अपनी भाषा पर गर्व करने वाले लोगों कीसंख्या बढ़ रही है और क्रिकेट के बारे में अब कहा जाने लगा है कि ये एक भारतीय खेलहै जो इंग्लैंड में पैदा हुआ है. इसका पर्याप्त देशीकरण हो चुका है. गेंद अब सुर्राजाने लगी हैं, शॉट हैलीकॉप्टर लगने लगे हैं, स्पिन दूसरा होने लगी है. इधर हमने हरचीज़ पर सत्यमेव जयते छाप दिया है लेकिन BCCI का लोगो आज भी ब्रिटिश गुलामी को ढोरहा है. BCCI के लोगो की खोज सन 1861 में हुई थी. BCCI के जन्म से 67 साल पहले. तबरानी विक्टोरिया ने ब्रिटिश राजा-रानी की सेवा करने वाले राजवाडों, अंग्रेज-भारतीयअफसरों को सर्वोन्नत ऑर्डर ऑफ स्टार ऑफ इंडिया से सम्मानित करने की परम्परा चलाई.यही मोस्ट एक्जॉल्टेड स्टार ऑफ इंडिया BCCI का लोगो है.गुलामी के दिनों में इसको लेने की मज़बूरी हो सकती है. उन दिनों भारत की कोई एकक्रिकेट संस्था नहीं थी. बहुत सारी क्रिकेट क्लब टीमें थीं. संयुक्त प्रदेश जो आजउत्तर प्रदेश कहलाता है, बड़ौदा (वहां से तो 2 अलग-अलग रजवाडों की 2 टीमें थीं),दिल्ली, केंद्रीय भारत और आज के पंजाब-हरियाणा-हिमाचल की एक टीम पंजाब. और भी बहुतसारी टीमें थीं. कोई धार्मिक लाइन पर तो कोई रजवाडों की लाइन पर.इधर 1907 में ICC की शुरूआत इंपीरियल क्रिकेट काउंसिल (बादशाही क्रिकेट परिषद) केतौर पर हुई थी. पटियाला के महाराजा भारत को इस बादशाही क्रिकेट परिषद में शामिलकरना चाहते थे और 1928 में उन्होंने सारे क्लबों को मिलाकर BCCI बनाई और तमिलनाडूमें एक सोसाइटी के रूप में दर्ज करवाया. आज तक BCCI एक निजी सोसाइटी है. पटियाला केमहाराजा खुद क्रिकेटर थे. पंजाब के कॉंग्रेसी नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह उसी घरानेसे हैं. तब महाराजा पटियाला के लिए हो सकता है कोई और प्रतीक इस्तेमाल करते तोमुश्किल खड़ी हो जाती या फिर ब्रिटेन वाले स्वराज के निशान को देखकर नाराज हो जातेऔर भारत को ICC में शामिल ही न करते. लेकिन आज तक BCCI उस ब्रिटिश स्टार ऑफ इंडियाको ढो रही है. 1965 में बादशाही क्रिकेट परिषद का नाम बदलकर पहले हुआ इंटरनेशलक्रिकेट कॉन्फ्रेंस और फिर 1989 में इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल. तब तक ऑस्ट्रेलियाऔर इंग्लैंड को लगभग वीटो का अधिकार था. वही लोग तय करते थे कि क्या नियम होगा कौनमैच रैफरी होगा.ये तो 1990 के बाद एशियाई टीमों के उदय और साउथ अफ्रीका की अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटमें वापसी के साथ थोड़ा ICC बदली है. इतनी बदली है कि उसका मुख्यालय लंदन से उठाकरदुबई कर दिया गया है. वैसे असली मुख्यालय तो मुंबई में BCCI का दफ्तर ही है. भारतकी टीम कितने ही मौकों पर रंगभेद झेल चुकी है. एक साथ भारत की आधी टीम पर बैन लगायाहै मैच रैफरियों ने, फिर भी BCCI वाले इस गुलामी के प्रतीक को ढो रहे हैं. इसकी 3वजहें हो सकते हैं. पहली ये कि सत्यमेव जयते सिर्फ सरकारी संस्थान इस्तेमाल करसकते हैं और BCCI भारत की संस्था नहीं बस एक निजी सोसाइटी रहना चाहती है. दूसरा,BCCI आलसी है. या फिर तीसरा BCCI वाले ब्रिटिश स्टार से प्यार करते हैं. BCCI केमैचों का एक नियम और है. भारत में होने वाले हर मैच में BCCI का लोगो दिखाया जाताहै और वो हर देश में जाता है. ब्रिटेन वाले पहचान ही लेते होंगे – सी दिस इजएक्जॉल्टेड स्टार ऑफ इंडिया गिवन बाई हैर हॉलीनेस क्वीन ऑफ ब्रिटिश एंपायर.ऊपर दाएं कोने में है ब्रिटिश स्टार ऑफ इंडियाअनुराग ठाकुर जी, हमारे गांव-शहरों के छोरे-छोरियां अंग्रेज़ों की निशानी पहनेअच्छा नहीं लगता. जगमोहन डालमिया जी के ज़माने में BCCI ने ICC सेइंग्लैड-ऑस्ट्रेलिया का वीटो तो खत्म कर दिया, पर अपना लोगो नहीं बदला. लोग बदलतेरहे हैं पर लोगो नहीं बदला. तो सोचना क्या है किसी अच्छे से डिजाइनर को कहिए प्यारासा लोगो बना दे. श्रीलंका वालों ने तो अपने बोर्ड का नाम तक बदलकर सही कर लिया है.सत्यमेव जयते न सही, कुछ और ही सही.