इस चुनाव के बाद ‘संतों के घर में झगड़ा भारी’ देखेने को मिलेगा
जिन पांच राज्यों में चुनाव के नतीजे आए हैं. उन पर भविष्य की पॉलिटिक्स का भी दारोमदार है. ये कैसे आने वाले कल को प्रभावित करेंगे, बता रहे हैं अरविंद दास.
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Source: PTI
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पांच राज्यों के चुनावी नतीजे आज आ गए. जीतने वाले लड्डू बांट रहे, हारने वाले अकेले में खंभे पकड़ के रो रहे होंगे. लेकिन ये डेमोक्रेसी है. इसमें ऐसा ही होता है भैया. इतनी हार और जीतों का भविष्य पर क्या असर पड़ेगा उस पर अनुमान लगा रहे हैं अरविंद दास. अरविंद दास ने जेएनयू से पीएचडी की है और इन दिनों करण थापर के साथ जुड़े हुए हैं. नई पीढ़ी के विचारशील लोगों में से हैं और कला, संस्कृति, समाज को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां करते रहते हैं.
केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के दो साल पूरे हो रहे हैं. इस मौके पर एक नारा सरकार की तरफ से आया है- जरा मुस्कुरा दो! देश की आम रियाया के लिए मोदी शासन के दौर में ‘अच्छे दिन’ आए या नहीं इस पर बहस जारी है. फिलहाल, दिल्ली और बिहार चुनाव में मिली करारी हार के बाद असम में BJP की प्रत्याशित पहली जीत ने केंद्र सरकार को मुस्कुराने की एक वजह ज़रूर दी है. एक बड़ी वजह. उत्तर-पूर्व में BJP पहली बार चुनाव जीतने में कामयाब रही है. केरल में राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाली UDF और भारतीय मार्क्सवादी पार्टी (CPM) के नेतृत्व वाली LDF के बीच yo-yo ट्रेंड (सत्ता की अदला-बदली) एक बार फिर से जारी है. हालांकि पिछले चुनाव की तुलना में LDF के सीटों में बढ़ोतरी हुई है. पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच जीत का अंतर महज चार सीटों का था, इस बार यह फ़ासला क़रीब 40 सीटों का है. इस लिहाज से LDF की जीत के साथ ही यह कांग्रेस की बड़ी हार भी है. वहीं, BJP भी अपना खाता खोलेने में सफल रही है. दूसरी ओर AIDMK की जयलिलता और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी की तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में फिर से वापसी BJP के लिए इस मायने में सुकून देने वाली है कि यह ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की दिशा में बढ़ा एक और क़दम है! और 2019 तक आते आते ऐसा लग रहा है कि राहुल गाँधी की मिट्टी और पलीद होने वाली है. कांग्रेस कुल मिला कर छह राज्यों में सिमट गई है, इसमें मणिपुर, मेघालय और मिजोरम जैसे छोटे राज्य भी शामिल हैं. राहुल गाँधी के लिए तिनके का सहारा पुडुच्चेरी है, जहाँ कांग्रेस गठबंधन सरकार बना सकती है. सवाल यह है कि इन चुनाव के नतीजों का केंद्र सरकार पर क्या असर पड़ेगा? ख़बरों के मुताबिक जून में तमिलनाडु से छह सदस्यों को राज्यसभा में भेजा जाना है. DMK-कांग्रेस गठबंधन की हार से आने वाले मानसून सेशन में NDA को जयललिता का समर्थन मिल सकता है. चुनाव जीत के बात प्रेस कांफ्रेंस में ममता बनर्जी ने भी अधर में लटके जीएसटी बिल पर अपने समर्थन की बात की है. इस मायने में ममता बनर्जी और जयललिता की जीत नरेंद्र मोदी के लिए सुखदायी है, उन्हें राज्यसभा में विपक्ष का विरोध कम झेलना पड़ेगा. संभव है विधानसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस के विरोध की धार भी कुंद हो और कई अहम बिल जो राज्यसभा में लटके पड़े हैं उस पर आम सहमति बन पाए. फिलहाल राज्यसभा में जहाँ कांग्रेस के 64 सदस्य हैं, वहीं BJP के 49. राजनीति अंतर्विरोधों का पुंज है और हमारे नेताओं को इसे साधना बखूबी आता हैं. ममता बनर्जी ने ये भी कहा है कि ‘भविष्य देश की जनता तय करेगी’. जाहिर है, भविष्य की बात कर ममता बनर्जी ने आगे की राजनीति और 2019 के आम चुनावों की ओर भी इशारा किया है. यदि आने वाले समय में विपक्ष ‘फेडरल फ्रंट’ की ओर आगे बढ़ता है तो नेता पद के लिए ममता की दावेदरी निश्चित है. वहीं पंजाब में यदि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जीतती है तो वे भी अपनी दावेदारी पेश करेंगें. बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार अपना घोड़ा पहले ही छोड़ चुके हैं. यानी आने वाले समय में ‘संतों के घर में झगड़ा भारी’ देखेने को मिल सकता है. वैसे बहुत कुछ अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड चुनाव से भी तय होना है. कहते हैं कि राजा में सात-सात हाथी का बल होता है. केंद्र में बैठा ‘राजा’ पहले से ही बलशाली है, उसे इन चुनाव नतीजों से और बल मिला है. विपक्ष में बैठा ‘राजकुमार’ पहले से कमजोर है, वह और भी कमजोर हुआ है. पर सच यह भी है कि सत्ता में बैठा राजा सवालों से डरता है. पिछले दो सालों में हमने प्रधानमंत्री का एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं देखा-सुना है, जहाँ वे सवालों से सीधे टकराए हों. मीडिया को भी अभी तक बमुश्किल दो-चार इंटरव्यू प्रधानमंत्री ने दिए हैं, जिनमें विदेशी मीडिया भी शामिल है. ऐसे में सत्ता एजेंडा सेट कर रही है और मीडिया बस उसका अनुसरण करती है. राजनीति के केंद्र में कभी बीफ बैन तो कभी राष्ट्रवाद आ जाता है, तो कभी फर्जी डिग्री और सड़कों का नामकरण! विकास, रोजगार और गर्वनेंस का मुद्दा ग़ायब है. बहरहाल, इन चुनाव नतीजों के बाद लोकतंत्र में विपक्ष की मजबूती के मद्देनज़र उम्मीद ममता-जयललिता पर आ टिकी है.
केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के दो साल पूरे हो रहे हैं. इस मौके पर एक नारा सरकार की तरफ से आया है- जरा मुस्कुरा दो! देश की आम रियाया के लिए मोदी शासन के दौर में ‘अच्छे दिन’ आए या नहीं इस पर बहस जारी है. फिलहाल, दिल्ली और बिहार चुनाव में मिली करारी हार के बाद असम में BJP की प्रत्याशित पहली जीत ने केंद्र सरकार को मुस्कुराने की एक वजह ज़रूर दी है. एक बड़ी वजह. उत्तर-पूर्व में BJP पहली बार चुनाव जीतने में कामयाब रही है. केरल में राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाली UDF और भारतीय मार्क्सवादी पार्टी (CPM) के नेतृत्व वाली LDF के बीच yo-yo ट्रेंड (सत्ता की अदला-बदली) एक बार फिर से जारी है. हालांकि पिछले चुनाव की तुलना में LDF के सीटों में बढ़ोतरी हुई है. पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच जीत का अंतर महज चार सीटों का था, इस बार यह फ़ासला क़रीब 40 सीटों का है. इस लिहाज से LDF की जीत के साथ ही यह कांग्रेस की बड़ी हार भी है. वहीं, BJP भी अपना खाता खोलेने में सफल रही है. दूसरी ओर AIDMK की जयलिलता और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी की तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में फिर से वापसी BJP के लिए इस मायने में सुकून देने वाली है कि यह ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की दिशा में बढ़ा एक और क़दम है! और 2019 तक आते आते ऐसा लग रहा है कि राहुल गाँधी की मिट्टी और पलीद होने वाली है. कांग्रेस कुल मिला कर छह राज्यों में सिमट गई है, इसमें मणिपुर, मेघालय और मिजोरम जैसे छोटे राज्य भी शामिल हैं. राहुल गाँधी के लिए तिनके का सहारा पुडुच्चेरी है, जहाँ कांग्रेस गठबंधन सरकार बना सकती है. सवाल यह है कि इन चुनाव के नतीजों का केंद्र सरकार पर क्या असर पड़ेगा? ख़बरों के मुताबिक जून में तमिलनाडु से छह सदस्यों को राज्यसभा में भेजा जाना है. DMK-कांग्रेस गठबंधन की हार से आने वाले मानसून सेशन में NDA को जयललिता का समर्थन मिल सकता है. चुनाव जीत के बात प्रेस कांफ्रेंस में ममता बनर्जी ने भी अधर में लटके जीएसटी बिल पर अपने समर्थन की बात की है. इस मायने में ममता बनर्जी और जयललिता की जीत नरेंद्र मोदी के लिए सुखदायी है, उन्हें राज्यसभा में विपक्ष का विरोध कम झेलना पड़ेगा. संभव है विधानसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस के विरोध की धार भी कुंद हो और कई अहम बिल जो राज्यसभा में लटके पड़े हैं उस पर आम सहमति बन पाए. फिलहाल राज्यसभा में जहाँ कांग्रेस के 64 सदस्य हैं, वहीं BJP के 49. राजनीति अंतर्विरोधों का पुंज है और हमारे नेताओं को इसे साधना बखूबी आता हैं. ममता बनर्जी ने ये भी कहा है कि ‘भविष्य देश की जनता तय करेगी’. जाहिर है, भविष्य की बात कर ममता बनर्जी ने आगे की राजनीति और 2019 के आम चुनावों की ओर भी इशारा किया है. यदि आने वाले समय में विपक्ष ‘फेडरल फ्रंट’ की ओर आगे बढ़ता है तो नेता पद के लिए ममता की दावेदरी निश्चित है. वहीं पंजाब में यदि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जीतती है तो वे भी अपनी दावेदारी पेश करेंगें. बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार अपना घोड़ा पहले ही छोड़ चुके हैं. यानी आने वाले समय में ‘संतों के घर में झगड़ा भारी’ देखेने को मिल सकता है. वैसे बहुत कुछ अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड चुनाव से भी तय होना है. कहते हैं कि राजा में सात-सात हाथी का बल होता है. केंद्र में बैठा ‘राजा’ पहले से ही बलशाली है, उसे इन चुनाव नतीजों से और बल मिला है. विपक्ष में बैठा ‘राजकुमार’ पहले से कमजोर है, वह और भी कमजोर हुआ है. पर सच यह भी है कि सत्ता में बैठा राजा सवालों से डरता है. पिछले दो सालों में हमने प्रधानमंत्री का एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं देखा-सुना है, जहाँ वे सवालों से सीधे टकराए हों. मीडिया को भी अभी तक बमुश्किल दो-चार इंटरव्यू प्रधानमंत्री ने दिए हैं, जिनमें विदेशी मीडिया भी शामिल है. ऐसे में सत्ता एजेंडा सेट कर रही है और मीडिया बस उसका अनुसरण करती है. राजनीति के केंद्र में कभी बीफ बैन तो कभी राष्ट्रवाद आ जाता है, तो कभी फर्जी डिग्री और सड़कों का नामकरण! विकास, रोजगार और गर्वनेंस का मुद्दा ग़ायब है. बहरहाल, इन चुनाव नतीजों के बाद लोकतंत्र में विपक्ष की मजबूती के मद्देनज़र उम्मीद ममता-जयललिता पर आ टिकी है.

