धोनी वहां हैं जहां सचिन, कोहली वहां जहां धोनी
टीम इंडिया के आज के हालात. टीम इंडिया को लीड करने वाले चेहरे. उनके हालात. उनके बारे में लग रही अटकलें लिख रहे हैं सुशोभित सक्तावत.
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फोटो - thelallantop
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सुशोभित सक्तावत इंदौर में रहते हैं, जिस सिवनी के जंगलों का जिक्र मोगली के किस्सों में होता है, वहां लगभग साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर. तो सुशोभित ने इंडियन क्रिकेट के आज के हालातों के बारे में बड़ा सोचा. और आदतन उसपे कुछ लिख डाला. क्या लिखा आप भी पढ़िए. और आपके पास भी कुछ हो जो आप सबको पढ़ाना चाहें तो लिख भेजिए lallantopmail@gmail.com पर
सदर (कप्तान) और नायब (उपकप्तान) की परस्पर डायनैमिक्स एक लंबे समय से विमर्श का विषय रही है, ख़ासतौर पर तब, जब नायब सदर से अधिक तेज़तर्रार और प्रतिभाशाली हो. वास्तव में यह एक गहरी दुविधा है. दुनिया का हर सदर चाहता है कि उसका नायब उसका सबसे मज़बूत बाज़ू साबित हो, लेकिन वह इतना मज़बूत नायब भी नहीं चाहता कि वह उसका ही तख़्ता उलट दे. इसे डंकन-मैकबेथ डायनेमिक्स भी कह सकते हैं, जिसमें मैकबेथ देर-सबेर डंकन को अपदस्थ कर ही देता है. महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली के साथ यही हो रहा है. दिन-ब-दिन विराट कोहली महेंद्र सिंह धोनी के आभामंडल पर ग्रहण की तरह आच्छादित होते जा रहे हैं. टेस्ट मैचों के कप्तान तो वे पहले ही बन चुके हैं, सीमित ओवरों की कप्तानी के लिए भी उनका दावा लगातार मज़बूत होता जा रहा है. एक कप्तान और बल्लेबाज़ के रूप में धोनी की हालिया नाकामियों ने भी इसमें योगदान दिया है. विडंबना यह है कि हाल के दिनों में या तो धोनी के नेतृत्व में भारतीय टीम हारती रही है या अगर वह जीतने में सफल हुई है, तो ऐसा विराट के प्रताप से ही संभव हो सका है. और स्वाभाविक ही है, जो व्यक्ति अपने दम पर मैच जीत रहा हो, वह ऐसा अपनी सरपरस्ती में करना ज़्यादा पसंद करेगा. हाल ही में सौरव गांगुली ने कहा कि उन्हें बहुत आश्चर्य होगा अगर धोनी आने वाले समय में भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान बने रहेंगे. गांगुली के ऐसा कहने के मायने हैं. ज़्यादा पुरानी बात नहीं है, जब "धोनी युग" ने भारतीय क्रिकेट के "गांगुली युग" का पटाक्षेप कर दिया था. क्रिकेट प्रशंसकों को याद है कि किस तरह से गांगुली को टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने पर मजबूर किया गया. उनके अंतिम मैच में खेल समाप्त होने से कुछ मिनट पहले धोनी ने गांगुली से अनुरोध किया था कि वे कप्तानी की कमान संभाले. यह सांत्वना पुरस्कार धोनी की सदाशयता थी, लेकिन क्या गांगुली इस सदाशयता को अपने लिए सम्मानजनक मान सकते थे? ख़ासतौर पर तब, जब वे आधुनिक भारतीय क्रिकेट के निर्विवाद निर्माता रहे हैं. एक-एक कर गांगुली युग के तमाम खिलाड़ी (वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, ज़हीर ख़ान, युवराज सिंह, हरभजन सिंह) हाशिये पर धकेल दिए गए. यही हाल राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, अनिल कुम्बले जैसे दिग्गजों का भी हुआ. द्रविड़ और लक्ष्मण को तो समारोहपूर्वक अपना आखिरी मैच खेलने का मौक़ा तक नहीं मिला. सबसे आखिर में महान सचिन तेंदुलकर को विदाई दी गई. वर्ष 2011 की विश्वकप विजय के बाद तेंडुलकर को भारतीय खिलाडि़यों ने कंधे पर बिठाकर वानखेड़े मैदान में घुमाया था. यह सचिन के लिए एक संकेत था कि अब वे विदाई की घोषणा कर दें. सचिन उस संकेत को समय रहते समझ नहीं सके. सचिन निश्चित ही अपने "हास्यास्पद अमरत्व" के प्रति सचेत नहीं थे और आज भी नहीं हैं. दिसंबर 2013 में सचिन विदा हुए. क्या वह "धोनी युग" का अधिकृत अनुमोदन था? नहीं. महज़ दो साल में तस्वीर बदल गई. आज धोनी ख़ुद को ठीक उसी जगह पा रहे हैं, जिस जगह सचिन थे. आज कोहली ख़ुद को उसी जगह पा रहे हैं, जिस जगह कभी धोनी थे. इतिहास ख़ुद को दोहराता है. लेकिन वह इतनी तेज़ी से ख़ुद को दोहराएगा, यह किसी ने सोचा ना था. ग़लती धोनी से भी हुई. उन्होंने ख़ुद को 10 गेंदों में 22 रन बनाने वाले खिलाड़ी तक सीमित कर लिया. वे टीम के कप्तान थे और तमाम सूत्र उनके हाथ में थे. वे बड़ी आसानी से एकदिवसीय मैचों में 22 शतक और 12 हज़ार रन बनाने वाले खिलाड़ी बन सकते थे, क्योंकि वे एक ऐसे देश में खेल रहे हैं, जो आंकड़ों और शतकों के प्रति ऑब्सेस्ड है. उन्हें एक बल्लेबाज़ और रन मशीन के रूप में अपनी legacy के प्रति अधिक सचेत रहना था. उन्होंने ख़ुद को ज़ाया किया. और अब समय उनके पास बचा नहीं है. धोनी जैसा "स्ट्रीट-स्मार्ट" खिलाड़ी इस बात को समझने से चूक गया, यह आश्चर्यजनक है. चूंकि धोनी तेंदुलकर नहीं हैं, इसलिए वे बीसीसीआई से अनुरोध नहीं करेंगे कि उनके लिए रांची में विदाई समारोह का एक भावुकतापूर्ण रियलिटी शो आयोजित किया जाए. बहुत संभव है वे औचक एक दिन संन्यास की घोषणा कर दें, जैसे उन्होंने टेस्ट क्रिकेट से संन्यास की घोषणा करके सबको चौंका दिया था. महेंद्र सिंह धोनी इससे बेहतर विदाई के हक़दार हैं. लेकिन उनके समेत किसी को भी यह अंदाज़ा नहीं था कि उनके हिस्से में इतना कम समय शेष रह गया था. निश्चित ही धोनी ऐसी किसी विजय की प्रतीक्षा नहीं कर रहे होंगे, जिसके बाद उन्हें कंधों पर बिठाकर मैदान में घुमाया जाए. या उन्हें सांत्वनापूर्वक चंद मिनटों के लिए अपने आखिरी मैच में कप्तानी करने का अवसर दिया जाए. यह धोनी की फ़ितरत नहीं है. ऐसा उसका मिजाज़ नहीं है. अपने शिखर दिनों में धोनी मैच जीतने के बाद मोटरसाइकिल से मैदान की परिक्रमा किया करते थे. वे एक दिन इसी तरह मोटरसाइकिल उठाएंगे और भारतीय क्रिकेट से दायरों से दूर चले जाएंगे. लेकिन कब? यह तो शायद "बेस्ट फ़िनिशर" भी नहीं बता सकता.

