'मैं महबूबा को नागपुर की नागिन नहीं बनने दूंगा'
आज यानी 22 जून जम्मू कश्मीर के लिए खास है. अनंतनाग में वोटिंग चालू है. महबूबा मुफ्ती को ये सीट निकालने में मुश्किल क्यों होगी. पढ़ो.
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सिर्फ वीर रस की कविताओं, देश-आर्मी भक्ति वाली फिल्मों और 'कश्मीर मांगे आजादी' वाला कश्मीर नहीं है. वो बच्चा सा स्टेट, जिसे कविताई भाषा में भारत माता का मुकुट कहा जाता है. उसकी पॉलिटिक्स इंटरनेशनल है. साथ ही हिंद-पाक दोनों देशों की पॉलिटिक्स कंट्रोल करने में बड़ा रोल जम्मू और कश्मीर का है. इंटरनेशनल लेवल पर इस पर कब्जेदारी के सब्जबाग दिखाकर अमेरिका दशकों पाकिस्तान को ठगता रहा. इसे कब्जे में लेने के वादे जो नेता पाकिस्तान में करता है वो पूजा जाता है. हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे हीरो बने फिरते हैं. उसी तरह हिंदुस्तानी नेता उस पर से दुश्मन को खदेड़ने के वादे से जीत जाता है.
खैर, हम इंटरनेशनल और नेशनल लेवल पर जम्मू कश्मीर की राजनीति नहीं बतियाते हैं. वहां स्टेट पॉलिटिक्स की बात करते हैं. वहां की जनता दिनोंदिन राजनीति में इंट्रेस्ट लेती जा रही है. पहले वोटिंग के टाइम लोग घर से नहीं निकलते थे. उनके अंदर "कोई नृप होय हमें क्या लाभ(हानी नहीं)" वाली फीलिंग चलती थी. क्योंकि उन्हें पता था वहां कोई भी शासन करे, वही मिलिट्री, वही कर्फ्यू वही दंगे होने हैं. लेकिन अब धीरे धीरे जागरुकता आ रही है. और अपने वोटिंग राइट्स इस्तेमाल करने का होश आ रहा है.
बीते सोमवार को इलेक्शन कैंपेन का आखिरी दिन था. पंफ्लेट, पोस्टर, बाजे भोंपू सब शांत हो गए. सारे उम्मीदवार अपनी उम्मीद लेकर आज किस्मत भरोसे बैठे होंगे.
सीएम महबूबा मुफ्ती को सीएम बने रहने के लिए विधायक बनना जरूरी है. अनंतनाग विधानसभा क्षेत्र से वो चुनाव लड़ी हैं. उनके लिए बहुत कठिन है डगर इस बार. यहीं पब्लिक फैसला सुना देगी कि बीजेपी के साथ गलबहियां करके पीडीपी ने जो सरकार बनाई उसे पब्लिक ने पसंद किया कि रिजेक्ट. हालांकि इनकी पार्टी को जीत का पूरा भरोसा है. जैसा कि हर नेता को वोट गिने जाने के दिन तक होता है. लेकिन पॉलिटिक्स पंडित दांतों में लौंग दबाके बैठ गए हैं. मतलब सब कुछ ठीक नहीं है.
बुधवार को अनंतनाग उपचुनाव में वोटिंग हो गई है. कुल 33.9 फीसद वोट पड़ा है. ये आंकड़ा घाटी में हुए पिछले तीन विधानसभा चुनावों के मुकाबले सबसे कम है. पिछले विधानसभा चुनाव में वोटिंग प्रतिशत 39 था, जबकि उससे पिछले साल 41 था. वोटिंग सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक हुई. 102 पोलिंग बूथ बनाए गए थे. जिनमें से 52 अतिसंवेदनशील और 50 संवेदनशील थे.
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महबूबा मुफ्ती 2004 में यहीं से सांसद बनीं. फिर 2014 में. फिलहाल जनवरी में हुई पापा की डेथ के बाद खुद सीएम की कुर्सी संभाली. एक लेगेसी उनके साथ ये चिपक गई है कि वो जम्मू कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं.
इसे हल्के में न लो. ये कुछ ऐसा है कि यूपी में कांग्रेस और बीजेपी के गठबंधन की सरकार बन जाए. या इससे भी आगे. भैया यहां तो सिर्फ नीतियों, विचारधाराओं की लड़ाई हो सकती है. क्योंकि यहां राजनैतिक उठापटक और अनिश्चितता जम्मू कश्मीर के बराबर नहीं, यानी ये काफी हद तक सामान्य राज्य है. और वो, हमेशा आग के ढेर पर बैठा स्टेट. हमेशा कुछ न कुछ बवाल होता रहता है. बीजेपी और आरएसएस की इमेज वहां एकदम साफ है. अधिकांश जनता इन पर रत्ती भर भरोसा नहीं करती. लेकिन अब खेला पलट चुका है. अनंतनाग का मूड बदला है महबूबा की तरफ से. क्योंकि उन्होंने बीजेपी से हाथ मिलाया है. जिसकी इमेज हिंदुत्ववादी पार्टी की है. और वहां हिंदुओं की आबादी 10 परसेंट है. मुसलमान बीजेपी से भरत मिलाप कर लेने वाली पार्टी को वोट कैसे देगी. ये समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है. ऐसे मौकों पर पब्लिक ठगा सा फील करती है. और उसके मुंह से अपने चुने हुए नेताओं के लिए एक ही बात निकलती है "सब चोर हैं."
इन्होंने भी आगे कदम बढ़ाया था. लेकिन नाम वापस ले लिया. अपनी जगह मुजीबुर्रहमान को खड़ा कर दिया. और उनके लिए प्रचार कर रहे हैं झमक के. जब तब महबूबा की खबर भी लेते हैं. 7 जून को स्टेट फ्लैग डे के मौके पर वजीर बाग में भीड़ लगी थी. वहीं पहुंचे थे इंजीनियर रशीद. वहां बताया कि ये आरएसएस की बी टीम है. और कहा "मैं महबूबा को नागपुर की नागिन नहीं बनने दूंगा."
खैर, हम इंटरनेशनल और नेशनल लेवल पर जम्मू कश्मीर की राजनीति नहीं बतियाते हैं. वहां स्टेट पॉलिटिक्स की बात करते हैं. वहां की जनता दिनोंदिन राजनीति में इंट्रेस्ट लेती जा रही है. पहले वोटिंग के टाइम लोग घर से नहीं निकलते थे. उनके अंदर "कोई नृप होय हमें क्या लाभ(हानी नहीं)" वाली फीलिंग चलती थी. क्योंकि उन्हें पता था वहां कोई भी शासन करे, वही मिलिट्री, वही कर्फ्यू वही दंगे होने हैं. लेकिन अब धीरे धीरे जागरुकता आ रही है. और अपने वोटिंग राइट्स इस्तेमाल करने का होश आ रहा है.
बीते सोमवार को इलेक्शन कैंपेन का आखिरी दिन था. पंफ्लेट, पोस्टर, बाजे भोंपू सब शांत हो गए. सारे उम्मीदवार अपनी उम्मीद लेकर आज किस्मत भरोसे बैठे होंगे.
सीएम महबूबा मुफ्ती को सीएम बने रहने के लिए विधायक बनना जरूरी है. अनंतनाग विधानसभा क्षेत्र से वो चुनाव लड़ी हैं. उनके लिए बहुत कठिन है डगर इस बार. यहीं पब्लिक फैसला सुना देगी कि बीजेपी के साथ गलबहियां करके पीडीपी ने जो सरकार बनाई उसे पब्लिक ने पसंद किया कि रिजेक्ट. हालांकि इनकी पार्टी को जीत का पूरा भरोसा है. जैसा कि हर नेता को वोट गिने जाने के दिन तक होता है. लेकिन पॉलिटिक्स पंडित दांतों में लौंग दबाके बैठ गए हैं. मतलब सब कुछ ठीक नहीं है.
बुधवार को अनंतनाग उपचुनाव में वोटिंग हो गई है. कुल 33.9 फीसद वोट पड़ा है. ये आंकड़ा घाटी में हुए पिछले तीन विधानसभा चुनावों के मुकाबले सबसे कम है. पिछले विधानसभा चुनाव में वोटिंग प्रतिशत 39 था, जबकि उससे पिछले साल 41 था. वोटिंग सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक हुई. 102 पोलिंग बूथ बनाए गए थे. जिनमें से 52 अतिसंवेदनशील और 50 संवेदनशील थे.
अनंतनाग से महबूबा का पुराना रिश्ता है
पीडीपी, मुफ्ती मोहम्मद सईद और उनकी बिटिया महबूबा मुफ्ती की टोटल हिस्ट्री ही अनंतनाग से शुरू और खतम है. मुफ्ती मोहम्मद सईद ने यहां से चुनाव लड़ा. और जीते. साल था 1998. अनंतनाग को कांग्रेस की तरफ से पार्लियामेंट में रिप्रजेंट कर रहे थे मुफ्ती मोहम्मद सईद. मतलब सांसद बने. फिर 1999 में उन्होंने जम्मू कश्मीर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई. विधानसभा का एलेक्शन भी अनंतनाग से लड़ा. तब भी पब्लिक इनके साथ रही. 2008 और 14 के चुनाव में उनको जीत हासिल हुई.Image: PTI
महबूबा मुफ्ती 2004 में यहीं से सांसद बनीं. फिर 2014 में. फिलहाल जनवरी में हुई पापा की डेथ के बाद खुद सीएम की कुर्सी संभाली. एक लेगेसी उनके साथ ये चिपक गई है कि वो जम्मू कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं.
अनंतनाग 'फन' क्यों फैलाए है
सन 2014 के एलेक्शन में पीडीपी ने जोर शोर से प्रचार किया. कि वही काश्मीर को बीजेपी से बचा सकती है. लंबे समय तक बीजेपी के विरोध में रही पीडीपी ने बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली. महबूबा की तरफ के ही कई बड़े नेता इसके खिलाफ थे. लेकिन उनकी कब तक चलती. AFSPA हटवाने का वादा भी किया. और कहा कि बीजेपी के साथ के बिना तो ये संभव होगा नहीं. लेकिन अभी तक सारे वादे इरादे हवा में हैं. हंदवाड़ा में आग फैली पड़ी है. मिलिटैंट राज्य सरकार का धुआं उड़ाए हुए हैं.इसे हल्के में न लो. ये कुछ ऐसा है कि यूपी में कांग्रेस और बीजेपी के गठबंधन की सरकार बन जाए. या इससे भी आगे. भैया यहां तो सिर्फ नीतियों, विचारधाराओं की लड़ाई हो सकती है. क्योंकि यहां राजनैतिक उठापटक और अनिश्चितता जम्मू कश्मीर के बराबर नहीं, यानी ये काफी हद तक सामान्य राज्य है. और वो, हमेशा आग के ढेर पर बैठा स्टेट. हमेशा कुछ न कुछ बवाल होता रहता है. बीजेपी और आरएसएस की इमेज वहां एकदम साफ है. अधिकांश जनता इन पर रत्ती भर भरोसा नहीं करती. लेकिन अब खेला पलट चुका है. अनंतनाग का मूड बदला है महबूबा की तरफ से. क्योंकि उन्होंने बीजेपी से हाथ मिलाया है. जिसकी इमेज हिंदुत्ववादी पार्टी की है. और वहां हिंदुओं की आबादी 10 परसेंट है. मुसलमान बीजेपी से भरत मिलाप कर लेने वाली पार्टी को वोट कैसे देगी. ये समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है. ऐसे मौकों पर पब्लिक ठगा सा फील करती है. और उसके मुंह से अपने चुने हुए नेताओं के लिए एक ही बात निकलती है "सब चोर हैं."
कौन कौन है टक्कर में
बहुत कांटे की लड़ाई है. सात कंडीडेट अनंतनाग की सीट पर लड़ रहे हैं. कांग्रेस से हिलाल अहमद शाह. जो पिछले चुनाव में महबूबा से हार गए थे. सिर्फ 6 हजार वोटों से. नेशनल कान्फ्रेंस से इफ्तिखार हुसैन मिसगर हैं. अलगाववादी नेता इंजीनियर अब्दुल रशीद तो याद ही होंगे. जिन्होंने बीफ पार्टी दी थी. तो जम्मू कश्मीर की असेंबली में बीजेपी नेताओं ने काली स्याही से नहला दिया था.इन्होंने भी आगे कदम बढ़ाया था. लेकिन नाम वापस ले लिया. अपनी जगह मुजीबुर्रहमान को खड़ा कर दिया. और उनके लिए प्रचार कर रहे हैं झमक के. जब तब महबूबा की खबर भी लेते हैं. 7 जून को स्टेट फ्लैग डे के मौके पर वजीर बाग में भीड़ लगी थी. वहीं पहुंचे थे इंजीनियर रशीद. वहां बताया कि ये आरएसएस की बी टीम है. और कहा "मैं महबूबा को नागपुर की नागिन नहीं बनने दूंगा."

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