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जब भी चूम लेता हूं उन हसीन आंखों को

मशहूर शायर और गीतकार कैफ़ी आज़मी की 14 साल पहले हमें छोड़ गये, याद करते हैं उन्हें, उनकी ही इक नज़्म से-

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10 मई 2016 (अपडेटेड: 10 मई 2016, 10:34 AM IST)
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मशहूर शायर और गीतकार कैफ़ी आज़मी की 14 साल पहले हमें छोड़ गये, कैफ़ी आज़मी को हम उनके हीर-रांझा, कागज के फूल, हकीकत और पाकीजा में लिखे गानों के कारण याद करते हैं. कैफी साहब को पद्मश्री, साहित्य अकादमी, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर अवार्ड से नवाजा गया था. कैफी साहब को याद करते हैं उनकी ही इक नज़्म से-

जब भी चूम लेता हूँ उन हसीन आँखों को सौ चराग़ अँधेरे में झिलमिलाने लगते हैं

ख़ुश्क* ख़ुश्क होंटो में जैसे दिल खिंच आता है दिल में कितने आईने थरथराने लगते हैं

फूल क्या शगूफ़े* क्या चाँद क्या सितारे क्या सब रकीब* कदमों पर सर झुकाने लगते हैं

ज़ेहन* जाग उठता है रूह जाग उठती है नक़्श* आदमियत के जगमगाने लगते हैं

लौ निकलने लगती है मंदिरों के सीने से देवता फ़ज़ाओं* में मुस्कुराने लगते हैं

रक़्स* करने लगतीं हैं मूरतें अजन्ता की मुद्दतों के लब-बस्ता* ग़ार गाने लगते हैं

फूल खिलने लगते हैं उजड़े उजड़े गुलशन में तिश्ना* तिश्ना गीती* पर अब्र छाने लगते हैं

लम्हा भर को ये दुनिया ज़ुल्म छोड़ देती है लम्हा भर को सब पत्थर मुस्कुराने लगते हैं

*ख़ुश्क-मुरझाए, शगूफ़े-कलियाँ, रकीब-दुश्मन, ज़ेहन-मन, नक़्श-छाप, फ़ज़ाओं-माहौल, रक़्स-नृत्य, लबबस्ता-बंद होंठों वाले, तिश्ना-प्यासी, गीती-धरती

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