CM की कुर्सी तो छोड़ दी सिद्दारमैया ने, लेकिन डीके और राहुल गांधी संग बड़ा 'खेल' कर गए
Siddaramaiah ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. लेकिन जाते-जाते वे एक ऐसा दांव खेल गए, जिसका खामियाजा उनके उत्तराधिकारी DK Shivakumar और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi को भुगतना पड़ेगा. पढ़ें खास रिपोर्ट...

साल 2023 में जब कांग्रेस ने कर्नाटक का विधानसभा चुनाव जीता तो पार्टी आलाकमान की एक मीटिंग में तय किया गया कि सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार ढाई-ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनेंगे. चूंकि दोनों नेताओं ने चुनाव जीताने में मदद की थी तो यह मांग जायज भी थी. मई 2026 में सिद्दारमैया के कार्यकाल के तीन साल पूरे हुए. डीके के समर्थकों ने मांग उठाई की कि अब समय आ चुका है कि आलाकमान अपना वादा पूरा करे.
लेकिन कुर्सी छोड़ना इतना आसान कहां है. सिद्दारमैया के लिए यह भी आसान नहीं था. खैर लंबे समय तक चली समझाइश-बुझाइश और मान मनौव्वल के बाद आखिरकार वे इस्तीफा देने के लिए तैयार हो गए. 28 मई को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. लेकिन जाते-जाते वे एक ऐसा दांव खेल गए, जिसका खामियाजा उनके उत्तराधिकारी डीके शिवकुमार और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को भुगतना पड़ेगा.
इंडिया टुडे से जुड़े अविनाश कटील की रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार, 27 मई को सिद्दारमैया ने पिछड़ा वर्ग आयोग की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वे (जाति जनगणना) रिपोर्ट को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी है. कर्नाटक में पिछड़े वर्ग के सबसे बड़ा नेता सिद्धारमैया को ही माना जाता है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जाते-जाते यह रिपोर्ट मंजूर करके उन्होंने पिछड़े वर्ग के नेता के तौर पर अपनी इमेज मजबूत की है. साथ ही उन्होंने यह भी तय कर दिया है कि इसके नतीजों को संभालने का बोझ पूरी तरह से डीके शिवकुमार पर आ जाए.
कर्नाटक के दो जाति सर्वेक्षणकर्नाटक ने पिछले नौ सालों में दो जाति सर्वे किए हैं. दोनों ही बार राज्य में सिद्धारमैया की सरकार थी. अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्होंने एच. कंथराज की लीडरशिप में एक जाति सर्वे कराया था, जो 2017 तक पूरा हो गया था. हालांकि, कई राजनैतिक और तकनीकी दिक्कतों की वजह से इसे सालों तक लागू नहीं किया गया.
कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत और वोक्कालिगा दो सबसे प्रभावशाली मजबूत समुदाय माने जाते हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि जाति सर्वे की रिपोर्ट में इन दोनों समुदायों की आबादी को काफी कम दिखाया गया. इसके विरोध में इन समुदायों के नेताओं, धार्मिक गुरुओं और खुद कांग्रेस पार्टी के भीतर के बड़े नेताओं (जैसे डी.के. शिवकुमार और एम.बी. पाटिल) ने रिपोर्ट को जारी करने का खुलकर विरोध किया. दावा किया गया कि यह सर्वे वैज्ञानिक तरीके से नहीं किया गया था.
2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. शुरुआत में सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी ने सरकार बनाई थी, लेकिन बहुमत साबित न कर पाने की वजह से बी.एस. येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद, कांग्रेस और जनता दल-सेक्युलर (JD-S) ने गठबंधन करके सरकार बनाई और जेडीएस नेता एच.डी. कुमारस्वामी राज्य के मुख्यमंत्री बने. लेकिन एक के बाद एक आई बीजेपी और जेडीएस-कांग्रेस सरकारों ने सर्वे के नतीजों पर विरोध के डर से रिपोर्ट पेश करने से परहेज किया. इस तरह यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में ही पड़ी रही.
2023 में सिद्धारमैया सत्ता में लौट कर आए. मई 2025 में उन्होंने एक नए जाति सर्वे का ऐलान किया. कहा गया कि इस बार पिछली गलतियों को सुधारा जाएगा और समुदाय की शिकायतों का भी ध्यान रखा जाएगा. यह नई जाति जनगणना रिपोर्ट नवंबर 2025 से ही अटकी पड़ी है.
डीके शिवकुमार के ‘गले की फांस’ क्यों है यह रिपोर्ट?
डीके शिवकुमार के लिए जाति जनगणना की यह रिपोर्ट उनके पॉलिटिकल करियर का सबसे मुश्किल मुद्दा बन सकता है. साथ ही पार्टी के अंदर उन्हें दूसरे दबावों का भी सामना करना पड़ सकता है. बताया जा रहा है कि रिवाइज्ड 2025 सर्वे में लगभग 5.9 करोड़ लोग शामिल थे और यह अब तक किसी भी राज्य ने इतना बड़ा जातिगत सर्वे नहीं किया है.
- 2025 की कर्नाटक जाति जनगणना के आधिकारिक आंकड़े अभी तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं. लेकिन लीक हुई जानकारियों और पिछले सर्वे के नतीजों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि कर्नाटक की आबादी में लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे बड़े समुदायों का हिस्सा क्रमशः लगभग 11% और 10-12% है.
- इसके साथ ही पिछड़े वर्गों और OBC समुदायों की हिस्सेदारी करीब 69.6% होने का अनुमान है. दावा यह भी किया जा रहा है कि मुसलमान लगभग 14% के साथ सबसे बड़ा सोशल ग्रुप हैं और कर्नाटक की राजनीति में उन्हें इग्नोर नहीं किया जा सकता.
दशकों से कर्नाटक की राजनीति लिंगायत और वोक्कालिगा के इर्द-गिर्द घूमती रही है. रिपोर्ट में बताए गए आंकड़ों ने इन समुदायों में चिंता पैदा कर दी है. क्योंकि सर्वे की रिपोर्ट में कथित तौर पर पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों की आबादी को ज्यादा दिखाया गया है, जबकि लिंगायतों और वोक्कालिगाओं की डेमोग्राफिक ताकत प्रचलित अनुमान से कम है. यह उनकी पारंपरिक रूप से मानी जाने वाली ताकत से कम है. पिछली रिपोर्ट (2017) में इसी बात को लेकर बवाल हुआ था. ऐसे आंकड़ों से रिजर्वेशन और पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन में बदलाव की नई मांगें शुरू हो सकती हैं.
सिद्दारमैया ने ‘AHINDA’ पॉलिटिक्स को खास तौर पर लिंगायत और वोक्कालिगा के दबदबे का मुकाबला करने के लिए तैयार किया था. अहिंदा यानी अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों का गठबंधन. जाति जनगणना रिपोर्ट के सार्वजनिक होने से अहिंदा गुट की संख्या का पता चलेगा और इससे लिंगायत-वोक्कालिगा बनाम अहिंदा गुट के बीच संघर्ष फिर से शुरू होने का खतरा पैदा हो जायेगा. इस तरह यह रिपोर्ट राजनीतिक रूप से संवेदनशील है. और यहीं से कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार (DKS) के लिए मुश्किलें शुरू हो जाती हैं.
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आगे कुआं, पीछे खाईंशिवकुमार न सिर्फ कर्नाटक में कांग्रेस के सबसे बड़े वोक्कालिगा नेता हैं, बल्कि उन्हें राज्य में पार्टी को फिर से खड़ा करने वाले संकटमोचक के तौर पर भी देखा जाता है. अगर वे रिपोर्ट को पेश करने या लागू करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो उन्हें वोक्कालिगा और लिंगायत समूहों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है. अगर वह इसमें देरी करते हैं, तो उन्हें ‘अहिंदा’ जनाधार के छिटकने का जोखिम उठाना पड़ सकता है, जिसे सिद्दारमैया ने पिछले कई सालों से कांग्रेस के लिए खड़ा किया था.
असल में, सिद्दारमैया ने एक ऐसा राजनीतिक दलदल तैयार कर दिया है, जहां डीके के लिए ‘आगे कुआं-पीछे खाईं’ वाली स्थिति पैदा हो गई थी. जाति जनगणना की रिपोर्ट को मंजूरी देकर जाते-जाते भी उन्होंने ‘अहिंदा’ गुट को मैसेज दे दिया है कि वे उनके साथ हैं. अब यह रिपोर्ट सार्वजनिक होती है या नहीं, इसका भार तो डीके के कंधो पर ही है. कई मायनों में, सिद्दारमैया के आखिरी राजनीतिक दांव ने शिवकुमार और राहुल गांधी दोनों को मुश्किल में डाल दिया है.
कर्नाटक के अगले नेतृत्व को अब दो में से एक को चुनना होगा. या तो प्रभावशाली और दबदबा रखने वाले जाति समूहों को नाराज करें, या फिर ‘अहिंदा’ गुट के भरोसे को दांव पर लगा दें. और शायद यही सिद्दारमैया का 'खामोश बदला' है. उनके उत्तराधिकारी और कांग्रेस का आलाकमान, दोनों ही एक ऐसी राजनीतिक लड़ाई में फंसे रहें जिसकी शर्तें खुद उन्होंने ही तय की हैं.
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