आए दिन हमारे पास ऐसे कमेंट्स आते हैं कि लड़कों की प्रॉब्लम्स पर भी बात कर लियाकरो. पुरुष तो आपको इंसान ही नहीं लगते न? पुरुषों के स्ट्रगल्स का क्या? कुछदिनों पहले हमने बताया था कि कौन सी वो बातें हैं जिन्हें जो एक लड़की के मां - बापको या किसी को भी उन्हें नहीं कहनी चाहिए. अब हम बताएंगे वो बातें जो किसी को भीलड़कों से नहीं कहनी चाहिए. इसके लिए हमने टीम के कुछ पुरुष साथियों से बात की.उन्होंने हमें बताया कि बचपन में बहुत सारी ऐसी बातें लड़कों से भी की जाती हैं जोउनके लिए परेशानी का कारण बन जाती हैं. वो कौन-कौन सी बातें हैं? चलिए जानते हैं. लड़कियों जैसे रोना बंद करो! लड़के तो बहादुर होते हैं, लड़के रोते नहीं हैं. रोतेहुए लड़के को चुप कराने के लिए अक्सर इसी तरह की बातें कही जाती हैं. बच्चों-बच्चोंकी लड़ाई में भी अगर बच्चा पिट जाए और रोने लगे तो उससे कहते हैं- लड़के होकर मारखा आए, हाथ में मेंदही लगी थी क्या. बार-बार कही गई इस तरह की बात लड़के के दिमागमें मैस्कुलिनिटी का एक ऐसा ढांचा बनता है जो उसे रोने से रोकता है. अगर वो रोता हैतो उसे लगता है कि उसमें कुछ कमी है. इस तरह की बातें कहते हुए आप लड़के के दिमागमें एक जेंडर डिवाइड बना रहे होते हैं. वो मानने लगता है कि लड़कियां कमज़ोर होतीहैं, इसलिए वो रो देती हैं. मर्द सख्त होते हैं, बहादुर होते हैं इसलिए वो रोतेनहीं बल्कि लड़ते हैं, अपनी ताकत दिखाते हैं. रोने को वो कमज़ोरी की निशानी माननेलगते हैं. ये नहीं समझ पाते हैं कि रोना मन हल्का करने का कितना बेहतरीन तरीका है.रोना कोई कमज़ोरी नहीं है बल्कि हंसने जितना ही नैचुरल और नॉर्मल ह्यूमन टेंडेंसीहै. इन फैक्ट, कई स्टडीज़ ये बता चुकी हैं कि रोना पुरुषों के लिए भी उतना हीज़रूरी है जितना महिलाओं के लिए. खाना बनाना तुम्हारा काम नहीं है लड़कों के दिमागमें शुरुआत से ही डाला जाता है कि खाना बनाना उनका काम नहीं है. कि खाना उनकी मांबनाएंगी, या बहन बनाएंगी या शादी के बाद पत्नी बनाएंगी. अगर कोई बच्चा रसोई का कामसीखने में इंटरेस्ट दिखाता भी है तो तुमसे नहीं होगा या क्या करोगे सीखकर या येतुम्हारा काम नहीं जैसी बातें कहकर उसे टाल दिया जाता है. जबकि घरों में लड़कियोंको खाना बनाने की खास ट्रेनिंग दी जाती है. लड़कों के दिमाग में ये नैरेटिव यहीं सेसेट होने लगता है कि रसोई-घर संभालने का काम लड़कियों का है. दूसरी चीज़ ये कि जबलड़का पढ़ाई के लिए या नौकरी के लिए घर से बाहर निकलता है तो उसकी डिपेंडेंसी पूरीतरह बाहर के खाने पर होती है, नतीजा लाइफस्टाइल बीमारियों के रूप में सामने आता है या फिर वो मैगी या खिचड़ी बनाने तक सीमित होकर रह जाता है. और इसी से सामने आती एकऔर तरह की बात- कब तक बाहर का खाएगा, शादी कर ले. जो लड़कों के दिमाग में इस बात कोऔर ज्यादा एन्फोर्स करती हैं कि पत्नी जो कुछ भी करे, खाना बनाना भी उसका ही कामहै. लड़कियों की तरह घर में क्यों घुसे रहते हो? बच्चों के बेहतर विकास और उनकीफिटनेस के लिए आउटडोर गेम्स ज़रूरी हैं. लेकिन कई लड़के ऐसे होते हैं जो इनडोरगेम्स पसंद करते हैं, बाहर खेलने की बजाए घर में रहना, किताबें पढ़ना प्रिफर करतेहैं. ऐसे लड़कों को खेलने के लिए बाहर भेजने के लिए अक्सर इस तरह की बातें की जातीहैं. ये एक तो उनके दिमाग में ये छवि बनाता है कि विमेन बिलॉन्ग टू इंडोर्स औरदूसरा ये कि लड़कों को आउटगोइंग होना चाहिए. कई बार पियर प्रेशर में इच्छा न होनेके बावजूद वो बाहर निकलते हैं. इसमें एक तरह से वो खुद को टॉर्चर कर रहे होतेहैं.,बच्चे को आउटडोर गेम्स के लिए मोटिवेट करने के लिए किसी और तरीके का भीइस्तेमाल किया जा सकता है. लड़के होकर ये नहीं आता? बचपन में साइकिल चलाने की बातहो या बाद में बाइक चलाने की या फिर किसी चीज़ की मरम्मत की बात. लड़कों को बल्बबदलना तो आना ही चाहिए टाइप की बातें. लेकिन, बल्ब बदलना और इस तरह के छोटे-मोटेकाम जेंडर स्पेसिफिक नहीं हैं. साइकिल या बाइक चलाना भी जेंडर स्पेसिफिक नहीं है.इसलिए ये काम नहीं आने पर किसी पुरुष को जज करने या कमेंट करने की बजाए आपको येसमझना चाहिए कि कोई काम आना या न आना उनकी अपब्रिंगिंग का हिस्सा होता है. हो सकताहै कि इन चीज़ों की कभी उन्हें ज़रूरत ही न पड़ी हो. कोई स्किल न आने पर कोई कम याज्यादा मर्द नहीं हो जाता. कोई काम सिखाने के पीछे आपका intention कितना ही अच्छाक्यों ना हो, जबतक आप सही शब्दों में उसे नहीं सिखाते, उसका कोई मतलब नहीं रह जाता.बड़े होकर तुम्हे ही खानदान की जिम्मेदारी उठानी है लड़कों पर जिम्मेदारी कागैरज़रूरी बोझ काफी कम उम्र में ही डाल दिया जाता है. ये जिम्मेदारियां कैसी? येबहन की सेफ्टी से शुरू होकर घर की फाइनेंशियल जिम्मेदारी तक जाता है. मेरा कलीगआयुष कहता है कि इंडियन मिडिल क्लास घर के लड़कों को स्टॉक एक्सचेंज की तरह देखताहै. उनपर ये सोचकर इन्वेस्ट किया जाता है कि वो आगे जाकर रिटर्न देंगे. उनकी हरचॉइस को इसी आधार पर question किया जाता है. बचपन में सब्जेक्ट इंटरेस्ट की बात होया आगे जाकर करियर के डिसिजन की. हमेशा कहा जाएगा, ज़िम्मेदार बनो. हमने बचपन सेसब किया ताकि तुम सहारा बनो. बहन की शादी होनी है, ज़िम्मेदार बनो. जल्दी पढ़ाई पूरीकरो. जल्दी नौकरी करो. एक तो हमारा सोशल स्ट्रक्चर ऐसा है कि सारी जमा पूंजी यातो बेटी की शादी में जाएगी या बेटे की पढ़ाई में. और रिटर्न के नाम पर बेटी परप्रेशर होता है 'शादी के लायक' बनने, घर के काम सीखने का और लड़कों पर प्रेशर होताहै पढ़ाई पूरी करते ही नौकरी करने और घर की जिम्मेदारी उठाने का. लेकिन ज़िम्मेदारीके नाम पर आप जो प्रेशर क्रिएट करते हैं उसका असर बहुत बुरा होता है. इस वजह से नावो उस काम को एन्जॉय कर पते हैं जो वो कर रहे हैं और ना ही खुलकर अपने इंटरेस्ट केहिसाब से कुछ चूज़ कर पाते हैं. बार-बार ज़िम्मेदारी के नाम पर आप बच्चों के इंटरेस्टको नज़रंदाज़ मत करिए. उसे ज़रूर बताइए कि उसे पढ़ाने के लिए आपने कितने सैक्रिफ़ाइस ,एफर्ट और अपनी लिमिट को पुश कर रहे हैं लेकिन उस पर अननेसेसरी प्रेशर मत क्रिएटकरिए.य क्या राय है आपकी मुझे कमेन्ट में बताइयेगा.