बेटी की शादी में अपनी खुशी से दिया जाने वाला गिफ्ट दहेज नहीं है. ये कहना है केरलहाई कोर्ट का. एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि शादी में दिए जानेवाले उपहार दुल्हन के लिए होते हैं. और उन्हें दहेज निषेध कानून के तहत दहेज के रूपमें नहीं गिना जाएगा. जस्टिस एमआर अनीता ने कहा, "शादी के समय दुल्हन को बिना किसीमांग के दिए जाने वाले उपहार, जो इस अधिनियम के तहत बनाई गई सूची में दर्ज किए गएहैं, दहेज निषेध एक्ट की धारा 3-(1) के दायरे में नहीं आएंगे.”Presents Gifted By Parents For Daughter's Welfare Not Dowry: Kerala High Court@hannah_mv_ https://t.co/jzih2QnHLd— Live Law (@LiveLawIndia) December 13, 2021 किस मामले पर लगाई गई थी याचिका?2020 में दीप्ति केएस नाम की एक महिला ने हिंदू रीति-रिवाज से एक व्यक्ति से शादीकी. कुछ समय बाद उनके रिश्ते में खटास आ गई. महिला ने आरोप लगाया कि शादी के समयदहेज में उसे जो गहने दिए गए थे, वो गहने एक बैंक के लॉकर में रखवाए गए थे. औरउसे वो गहने नहीं दिए गए. दीप्ति ने अपने गहने वापस पाने के लिए दहेज निषेध अधिकारीसे गुहार लगाई. याचिका दायर कर की और अपने पति खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की.दीप्ति ने मांग की कि उसे सभी उपहार वापस कर दिए जाएं. दहेज निषेध अधिकारीने दीप्ति के पति को निर्देश दिया कि वह गहने लौटा दे. इसके खिलाफ दीप्ति के पति नेकेरल हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी. दीप्ति के परिवार ने सभी गहने कपल के नाम एकबैंक लॉकर में जमा कर दिए. यह भी बताया कि लॉकर की चाभी भी दीप्ति के पास ही थी.वक़ीलों ने तर्क दिया कि दहेज निषेध अधिकारी के पास याचिका पर कार्रवाई करने काअधिकार नहीं है क्योंकि जो गहने उसके लिए उपहार में दिए गए थे, उसे बैंक लॉकर मेंरखा गया था. जज ने फ़ैसले में कहा - "इस मामले में सबूतों के अभाव में, दहेज निषेधअधिकारी को नियम 6-(xv) के तहत निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं है. इसलिए पारितकिए गए आदेश को रद्द किया जाता है." क्या कहता है केरल का दहेज निषेध कानून? दहेजके मामलों के निपटारे के लिए 2021 में केरल सरकार ने दहेज निषेध कानून में बदलावकरते हुए जिलों में दहेज अधिकारियों को नियुक्त किया. कानून के मुताबिक, शादी मेंदिए गए कीमती सामान तीन महीने के अंदर लड़की को ट्रांसफर करना अनिवार्य है. ज़िलामहिला एवं बाल विकास अधिकारियों को अपने ज़िलों में दहेज निषेध अधिकारी के रूप मेंकाम करने का अधिकार भी दिया गया था. कितना सही, कितना ग़लत है फ़ैसला? ये समझने केलिए हमने बात की एडवोकेट स्वाति उपाध्याय सिंह से, जो इलाहाबाद हाई कोर्ट कीलखनऊ पीठ में प्रैक्टिस कर रही हैं. उन्होंने बताया, "क़ानूनी तौर पर कहा जाए तोअगर माता-पिता अपनी बेटी को उपहार के रूप में कुछ दे रहे हैं तो वह दहेज की श्रेणीमें नहीं आएगा. दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार, 'जो उपहार दूल्हे को शादी केसमय दिए जाते हैं, किसी मांग के बिना, उसे गिफ़्ट्स के रूप में गिना जाएगा." स्वातिने आगे कहा, "अगर कोई ऐसा मामला सामने आता है, जहां एक लड़की यह दावा कर रही है किउसके ससुराल वाले दहेज की मांग कर रहे हैं और उसके साथ शारीरिक या मौखिक रूपदुर्व्यवहार किया जा रहा है, तो लड़के और उसके परिवार वालों को ये साबित करना होगाकि दहेज की मांग नहीं की गई है. आमतौर पर ऐसे मामलों में कोर्ट की सहानभूति लड़कीके पक्ष में देखने को मिलती है." हालांकि, कई मामलों में ये देखा जाता है कि दहेजकी मांग डायरेक्ट नहीं होती है. कभी इशारों में, कभी किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यमसे मांग की जाती है. कभी ये बताया जाता है कि हमने तो अपनी बेटी की शादी इतने मेंकी थी. तो कभी शादी के संकल्प के नाम पर सवाल किया जाता है. कई ऐसे केसेस होते हैंजिनमें दहेज मांगा नहीं जाता, लेकिन शादी के बाद लड़की को सुनाया जाता है कि अपनीबेटी की शादी में उन्होंने उसके ससुराल वालों को क्या-क्या गिफ्ट दिया था. या फलानेकी बहू क्या-क्या लेकर आई थी. ऐसे में दहेज और तोहफ़े के बीच की लाइन बहुत महीन होजाती है.