योगी आदित्यनाथ बेहतरीन कोरोना मैनेजमेंट की बात कह रहे, लेकिन सच इसके उलट है
ऑक्सीजन खत्म होने पर बीजेपी सांसद ने ही धरने पर बैठने की चेतावनी दी थी.
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Yogi Adityanath का कहना है कि कोरोना को नियंत्रित करने में यूपी अच्छा काम कर रहा है. (फोटो: आजतक)
उत्तर प्रदेश सरकार के कोरोना मैनेजमेंट पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. 25 अप्रैल को कई अख़बारों में ख़बर छपी. बक़ौल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, यूपी में कहीं भी ऑक्सिजन की किल्लत नहीं है. आदित्यनाथ ने ये भी कहा कि समस्या कालाबाज़ारी की है. ये दावा उस समय आया है, जब यूपी में ऑक्सिजन की किल्लत को किसी भी हाल में नकारा नहीं जा सकता है. राजधानी लखनऊ तक के निजी अस्पताल, जिनमें मेकवेल अस्पताल और मेयो मेडिकल सेंटर का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है, नोटिस भी चस्पा कर चुके हैं कि ऑक्सिजन नहीं है. सरकारी अमले का कहना है कि कुछ अस्पतालों में ऑक्सिजन न होने की ख़बर वायरल हुई थी, जब जांच हुई तो पता चला कि ऑक्सिजन की कोई कमी नहीं है.
पति की मौत के बाद रेनु सिंघल फफक-फफकर रोने लगीं. (फोटो: अमर उजाला)
आगरा से चलिए मेरठ. यहां के न्यूटिमा अस्पताल में नोटिस लग गया कि अस्पताल में ऑक्सिजन नहीं है, अपने मरीज़ को कहीं और ले जाएं. यहां के केएमसी अस्पताल का हाल और भी बुरा है. यहां के केएमसी नर्सिंग कॉलेज की प्रिंसिपल संध्या चौहान ने आज तक से बातचीत में बताया कि पिछले 24 घंटे में ऑक्सिजन नहीं होने के कारण 8 लोगों की मौत हो गई. ऑक्सिजन कम होने के कारण दूसरे अस्पतालों में लोगों को ट्रान्स्फ़र किए जाने का अनुरोध कर दिया गया. तीमारदार अपने मरीज़ों के लिए ऑक्सिजन का इंतज़ाम कर रहे हैं, ऐसी भी ख़बरें आयीं. क्या अब भी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किए गए इस दावे पर भरोसा किया जा सकता है कि यूपी में ऑक्सिजन की कोई कमी नहीं है? अगर स्वीकार करने में ज़रा भी हिचकिचाहट हो, तो मोहनलालगंज से बीजेपी सांसद कौशल किशोर की बात सुन लीजिए.
एक वीडियो ट्वीट करते हुए कौशल किशोर ने कहा कि फिर से प्रशासन को अवगत कराना चाहता हूं कि लखनऊ में ऑक्सिजन की बड़ी किल्लत है. ऑक्सिजन रिफिलिंग प्लांट पर लोग दिन-रात खड़े रहे, उसके बावजूद ऑक्सिजन नहीं मिल पा रही. मजबूर होकर मुझे धरने पर बैठना पड़ेगा जो मैं नहीं चाहता. मेरे धरने पर बैठने से अफरा-तफरी का माहौल बनेगा.
और इन सब शिकायतों के जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार कहती है कि कालाबाज़ारी हो रही है. ज़ाहिर-सी बात है कि कालाबाज़ारी एक समस्या है. लोग एहतियातन घरों में सिलिंडर और दवाएं इकट्ठा कर ले रहे हैं. डर ये कि समय पड़ने पर चीज़ें नहीं मिलेंगी. ऐसे में जो सिलिंडर 500-600 में लोगों को उपलब्ध हो सकता है, उसके लिए 50 हज़ार रुपए लोगों को चुकाने पड़ रहे हैं. तो ऐसे में कालाबाज़ारी रोकना और उसे न बढ़ने देना किसकी ज़िम्मेदारी है? देश को इस क़िल्लत से जूझते 2 हफ़्ते से ज़्यादा समय बीत चुका और कालाबाज़ारी अब भी चालू है, इस पर किसकी जवाबदेही तय होती है? सरकार ने क्या कदम उठाए? लेकिन यूपी सरकार ने कुछ क़दम उठाने का दावा भी किया है. पिछले दिनों एक फ़ैसला आया कि बिना सीएमओ की अनुमति के किसी कोरोना पेशेंट को अस्पताल में भर्ती नहीं किया जाएगा. कुछेक दिनों बाद लखनऊ समेत दूसरे शहरों को इस नियम से छूट दे दी गयी. अब यूपी सरकार ने कहा है कि सभी कोविड अस्पतालों को बिना किसी नकार के कोरोना के मरीज़ों को भर्ती करना होगा. अगर अस्पताल में बेड नहीं हैं, तो उन्हें किसी नज़दीकी निजी अस्पताल में रेफ़र करना होगा. ऐलान ये कि इलाज का सारा ख़र्च प्रदेश सरकार उठाएगी.
सोशल मीडिया पर अफ़वाह फैलाने वालों के खिलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई का भी फ़ैसला आ चुका है और कथित रूप से अफ़वाह फैलाने वालों की संपत्ति ज़ब्त होगी, ऐसा भी नियम में नत्थी है.
यही नहीं. जो अस्पताल ऑक्सिजन नहीं होने की अफ़वाह फैलाएंगे, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी. दवाओं की कालाबाजारी रोकने के लिए क़ानूनी कार्रवाई और रासुका लगा देने तक के ऐलान पहले ही किए जा चुके हैं. ‘अफ़वाह’ शब्द के यूपी सरकार के लिए क्या मानी होंगे, ये भी देखने की बात होगी.
लेकिन आशा है कि इन नियमों क़ानूनों और तैयारियों से समस्याएं हल हों, क़िल्लत दूर हो. लोग बचाए जा सकें.
बात बस यूपी की ही क्यों करना. क्या केंद्र सरकार की कोविड मैनेजमेंट पॉलिसी की आलोचना करते राहुल गांधी ने अपनी ही पार्टी द्वारा शासित राज्य छत्तीसगढ़ का रुख किया है? क्या वहां सब सही चल रहा है? ख़बरों का रुख करते हैं. इंडियन एक्सप्रेस में दो रोज़ पहले छपी ख़बर बताती है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने सरकारी पोर्टल पर दावा किया कि अगस्त 2020 तक उनके कोविड सेंटरों पर कुल 937 वेंटिलेटर थे, लेकिन अख़बार द्वारा एकत्रित की गयी सूचना बताती है कि छत्तीसगढ़ सरकार के पास महज़ 497 वेंटिलेटर ही मौजूद थे. जितना प्रसार किया गया, उससे लगभग आधा. इसके अलावा पिछले साल पहली लहर आने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने 23 ऑक्सिजन प्लांट के साथ 9 मेडिकल ऑक्सिजन स्टोरेज फ़ैसिलिटी स्थापित करने की योजना बनायी थी. ये परियोजना नवंबर में शुरू हुई थी. ख़बर बताती है कि अप्रैल तक कुल 15 ऑक्सिजन प्लांट ही बन सके हैं और 9 में से एक भी स्टोरेज फ़ैसिलिटी नहीं तैयार हो सकी है. इस समय रैलियों पर लगाम लगा चुकी कांग्रेस पार्टी को ये भी जवाब देना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के CM भूपेश बघेल अप्रैल के पहले हफ़्ते तक ख़ुद असम में रैलियां सम्बोधित क्यों कर रहे थे? क्या वो समय संजीदा हो जाने और सबकुछ को बचा लेने का नहीं था?
क्या यही सच है? सच सोशल मीडिया पर बहुत आसानी से उपलब्ध है. बहुत खोजबीन करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी. जो भी सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हों, उसे खोलकर देख लीजिए. कीवर्ड सर्च पर ही यूपी की बहुतेरी ख़बरें ऑक्सिजन और बेड मांगती हुई मिल जाएंगी. एक ख़बर और वायरल तस्वीर का ज़िक्र तो हम ही किए देते हैं. आगरा का मामला है. आगरा की रहने वाली रेणू सिंघल अपने पति रवि सिंघल को लेकर अस्पताल जा रही थीं.रवि की तबियत ख़राब हुई तो रेणू उन्हें लेकर अस्पताल गयीं. अस्पताल में ऑक्सिजन नहीं मिला. रेणू ने अपने पति को माउथ टू माउथ सांस देने का प्रयास किया. ये प्रयास असफल था. रवि ने रेणू की बांह में ही दम तोड़ दिया.In the last 3 days, fresh COVID19 positive cases have gone down in the state. There in no shortage of beds, oxygen and life saving drugs in the State: Chief Minister Yogi Adityanath pic.twitter.com/JkRQy5KgHf
— ANI UP (@ANINewsUP) April 26, 2021
पति की मौत के बाद रेनु सिंघल फफक-फफकर रोने लगीं. (फोटो: अमर उजाला)
आगरा से चलिए मेरठ. यहां के न्यूटिमा अस्पताल में नोटिस लग गया कि अस्पताल में ऑक्सिजन नहीं है, अपने मरीज़ को कहीं और ले जाएं. यहां के केएमसी अस्पताल का हाल और भी बुरा है. यहां के केएमसी नर्सिंग कॉलेज की प्रिंसिपल संध्या चौहान ने आज तक से बातचीत में बताया कि पिछले 24 घंटे में ऑक्सिजन नहीं होने के कारण 8 लोगों की मौत हो गई. ऑक्सिजन कम होने के कारण दूसरे अस्पतालों में लोगों को ट्रान्स्फ़र किए जाने का अनुरोध कर दिया गया. तीमारदार अपने मरीज़ों के लिए ऑक्सिजन का इंतज़ाम कर रहे हैं, ऐसी भी ख़बरें आयीं. क्या अब भी उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किए गए इस दावे पर भरोसा किया जा सकता है कि यूपी में ऑक्सिजन की कोई कमी नहीं है? अगर स्वीकार करने में ज़रा भी हिचकिचाहट हो, तो मोहनलालगंज से बीजेपी सांसद कौशल किशोर की बात सुन लीजिए.
एक वीडियो ट्वीट करते हुए कौशल किशोर ने कहा कि फिर से प्रशासन को अवगत कराना चाहता हूं कि लखनऊ में ऑक्सिजन की बड़ी किल्लत है. ऑक्सिजन रिफिलिंग प्लांट पर लोग दिन-रात खड़े रहे, उसके बावजूद ऑक्सिजन नहीं मिल पा रही. मजबूर होकर मुझे धरने पर बैठना पड़ेगा जो मैं नहीं चाहता. मेरे धरने पर बैठने से अफरा-तफरी का माहौल बनेगा.
और इन सब शिकायतों के जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार कहती है कि कालाबाज़ारी हो रही है. ज़ाहिर-सी बात है कि कालाबाज़ारी एक समस्या है. लोग एहतियातन घरों में सिलिंडर और दवाएं इकट्ठा कर ले रहे हैं. डर ये कि समय पड़ने पर चीज़ें नहीं मिलेंगी. ऐसे में जो सिलिंडर 500-600 में लोगों को उपलब्ध हो सकता है, उसके लिए 50 हज़ार रुपए लोगों को चुकाने पड़ रहे हैं. तो ऐसे में कालाबाज़ारी रोकना और उसे न बढ़ने देना किसकी ज़िम्मेदारी है? देश को इस क़िल्लत से जूझते 2 हफ़्ते से ज़्यादा समय बीत चुका और कालाबाज़ारी अब भी चालू है, इस पर किसकी जवाबदेही तय होती है? सरकार ने क्या कदम उठाए? लेकिन यूपी सरकार ने कुछ क़दम उठाने का दावा भी किया है. पिछले दिनों एक फ़ैसला आया कि बिना सीएमओ की अनुमति के किसी कोरोना पेशेंट को अस्पताल में भर्ती नहीं किया जाएगा. कुछेक दिनों बाद लखनऊ समेत दूसरे शहरों को इस नियम से छूट दे दी गयी. अब यूपी सरकार ने कहा है कि सभी कोविड अस्पतालों को बिना किसी नकार के कोरोना के मरीज़ों को भर्ती करना होगा. अगर अस्पताल में बेड नहीं हैं, तो उन्हें किसी नज़दीकी निजी अस्पताल में रेफ़र करना होगा. ऐलान ये कि इलाज का सारा ख़र्च प्रदेश सरकार उठाएगी.
सोशल मीडिया पर अफ़वाह फैलाने वालों के खिलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई का भी फ़ैसला आ चुका है और कथित रूप से अफ़वाह फैलाने वालों की संपत्ति ज़ब्त होगी, ऐसा भी नियम में नत्थी है.
यही नहीं. जो अस्पताल ऑक्सिजन नहीं होने की अफ़वाह फैलाएंगे, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी. दवाओं की कालाबाजारी रोकने के लिए क़ानूनी कार्रवाई और रासुका लगा देने तक के ऐलान पहले ही किए जा चुके हैं. ‘अफ़वाह’ शब्द के यूपी सरकार के लिए क्या मानी होंगे, ये भी देखने की बात होगी.
लेकिन आशा है कि इन नियमों क़ानूनों और तैयारियों से समस्याएं हल हों, क़िल्लत दूर हो. लोग बचाए जा सकें.
बात बस यूपी की ही क्यों करना. क्या केंद्र सरकार की कोविड मैनेजमेंट पॉलिसी की आलोचना करते राहुल गांधी ने अपनी ही पार्टी द्वारा शासित राज्य छत्तीसगढ़ का रुख किया है? क्या वहां सब सही चल रहा है? ख़बरों का रुख करते हैं. इंडियन एक्सप्रेस में दो रोज़ पहले छपी ख़बर बताती है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने सरकारी पोर्टल पर दावा किया कि अगस्त 2020 तक उनके कोविड सेंटरों पर कुल 937 वेंटिलेटर थे, लेकिन अख़बार द्वारा एकत्रित की गयी सूचना बताती है कि छत्तीसगढ़ सरकार के पास महज़ 497 वेंटिलेटर ही मौजूद थे. जितना प्रसार किया गया, उससे लगभग आधा. इसके अलावा पिछले साल पहली लहर आने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने 23 ऑक्सिजन प्लांट के साथ 9 मेडिकल ऑक्सिजन स्टोरेज फ़ैसिलिटी स्थापित करने की योजना बनायी थी. ये परियोजना नवंबर में शुरू हुई थी. ख़बर बताती है कि अप्रैल तक कुल 15 ऑक्सिजन प्लांट ही बन सके हैं और 9 में से एक भी स्टोरेज फ़ैसिलिटी नहीं तैयार हो सकी है. इस समय रैलियों पर लगाम लगा चुकी कांग्रेस पार्टी को ये भी जवाब देना चाहिए कि छत्तीसगढ़ के CM भूपेश बघेल अप्रैल के पहले हफ़्ते तक ख़ुद असम में रैलियां सम्बोधित क्यों कर रहे थे? क्या वो समय संजीदा हो जाने और सबकुछ को बचा लेने का नहीं था?

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