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'माय नेम इज खान एंड आई सप्लाई नमक इन पाकिस्तान'

'500 साल तक पूरी दुनिया को नमक दे सकता हूं. बस कभी घमंड नहीं किया.'

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फोटो - thelallantop
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विकास टिनटिन
20 मार्च 2016 (Updated: 19 मार्च 2016, 04:43 AM IST)
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इश्क के नमक को आशिक बेहतर समझते होंगे. लेकिन जुबां पर लगने वाले नमक को पूरी दुनिया समझती है. क्या एनीमल, क्या इंसान. आप जानते हैं इत्ता नमक आखिर आता कहां से है? हां, कंपनियां हैं. समंदर में नहाकर नमक बनाने में लगी हुई हैं. लेकिन हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसी पाकिस्तानी खान के बारे में, जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी नमक की खान है. खेवड़ा नमक खान. ये खान इत्ती बड़ी है कि आने वाले 500 साल तक नमक की सप्लाई की जा सकती है. RTR1SIO9 पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से करीब 160 किलोमीटर दूरी पर है झेलम जिला. इस खान से सदियों से सेंधा नमक निकाला जा रहा है. इस जगह इत्ता नमक था कि अभी सैकड़ों साल खुदाई कर नमक निकाला जा सकता है. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी नमक की खान खेवड़ा से पहले ओनटारियो की सिफ्टो कनाडा सॉल्ट माइंस है. working-mine
हर साल इस खान से करीब 4.65 लाख टन नमक निकाला जाता है. खान में करीब 18 वर्किंग लेवल और 40 किलोमीटर लंबा टनल है. खान के अंदर नमक से बनी एक मस्जिद भी है, जहां जाकर नमाजी भी नमाज अता करते हैं. खान में एक अस्थमा क्लीनिक भी है, जहां नमक की मदद से फेफड़ों की बीमारी दूर करने की कोशिश की जाती है. अस्थमा क्लीनिक में करीब 12 बेड हैं. यहां खूबसूरती और रोशनी के लिए लगे लैंप भी नमक से बने होते हैं.
सिकंदर के घोड़े थे खेवड़ा खान के फाउंडर खेवड़ा खान को मायो खान के नाम से भी जानते हैं. 320 बीसी में सिंकदर जब भारत की तरफ आ रिया था, तब ये खान सामने आई थी. किस्सा यूं था कि सिकंदर के सैनिक इंडिया की तरफ बढ़ रहे थे. सिकंदर के सैनिकों का काफिला जब इस इलाके से गुजर रहा था, तब सैनिकों ने काफिले के घोड़ों को खान की दीवारों को चाटते हुए देखा. जिसके बाद लोगों को पता चला पाया कि वहां नमक की इत्ती बड़ी खान है. Mined_area_from_Mughal_Timesमुगल से अंग्रेजों तक... सिंकदर के घोड़ों की खोज को मुगलों ने व्यापार में बदल दिया. मुगलों ने खेवड़ा की खान से निकले नमक का बिजनेस शुरू कर दिया. मुगल सल्तनत के बाद सिख कमांडर इन चीफ हरि सिंह नालवा ने खान का मैनेजमेंट संभाला. salt-showpiece सिख शासन के दौरान खेवड़ा खान से निकलने वाले नमक को खाने और बेचने दोनों के लिए इस्तेमाल किया गया. 1872 में अंग्रेजों के आने के बाद खान पर ब्रिटिश सरकार का कब्जा रहा. इस वक्त खान को  'पाकिस्तान मिनिरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन' संभालती है. यहां काम करने वाले मजदूरों को रोजाना करीब 250 से 300 रुपये तक मिलते हैं. saltहर साल आते हैं ढाई लाख टूरिस्ट खेवड़ा खान इत्ती आकर्षक है कि हर साल करीब ढाई लाख लोग यहां आते हैं. खान के अंदर तक ले जाने के लिए रेल का इंतजाम रहता है. खान के अंदर कई जगह नमकीन पानी के पूल्स हैं. minar-e-pakistan खान से निकलने वाले नमक को शो पीस बनाने के लिए भी यूज किया जाता है. खेवड़ा खान के लैंप, एस्ट्रे, स्टैचू पूरे पाकिस्तान में फेमस हैं.

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