The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • News
  • Why is there a shortage of oxygen in the country during the second wave of coronavirus?

कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की किल्लत क्यों हो गई है?

सरकार ने कोरोना वायरस की पहली लहर से कुछ नहीं सीखा?

Advertisement
Img The Lallantop
कोरोना की दूसरी लहर में मेडिकल ऑक्सीजन की मांग कई गुना बढ़ गई. लोग इसके लिए दर-दर भटके. हालांकि ऑक्सीजन को सही तरह से मैनेज करने की बात पिछले साल ही खास कमेटी ने कही थी. फोटो- PTI
pic
लल्लनटॉप
21 अप्रैल 2021 (अपडेटेड: 21 अप्रैल 2021, 04:59 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share
बड़ी ख़बर में हम आज बात करेंगे देश में ऑक्सीजन की क़िल्लत के बारे में. 20 अप्रैल को ही देश के अलग-अलग हिस्सों से ख़बरें आने लगीं कि अस्पतालों में कुछ घंटों का ऑक्सीजन का स्टॉक बचा हुआ है. केंद्र सरकार को ख़त लिखा गया. मदद का भरोसा दिया गया. कुछ ही घंटों में दिल्ली के अस्पतालों को ऑक्सीजन का स्टॉक मिल गया. लेकिन संकट अभी टला नहीं है. ऑक्सीजन का स्टॉक भी एकाध दिन का ही है. ऐसे में ऑक्सीजन का सतत अस्पतालों को मिलते रहना चाहिए, ये ज़रूरी है. ऐसे में क्यों न देश की हवा का जायज़ा लिया जाए. ऑक्सीजन की कार्यप्रणाली और उसकी समस्याओं को ध्यान से देखा जाए.
ऐसे में सबसे पहला सवाल, देश में कितना ऑक्सीजन का उत्पादन होता है?
ऑल इंडिया इंडस्ट्रीयल गैसेज़ मैन्युफ़ैक्चरर्स असोसीएशन के मुताबिक़, स्टील प्लांट समेत देश में रोज़ 7300 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का उत्पादन किया जा रहा है. बड़े उत्पादकों में आइनॉक्स एयर प्रोडक्स्टस, गोयल एमजी गैसेज़ प्राइवेट लिमिटेड और नेशनल ऑक्सीजन का नाम शामिल है.
इन्हीं आंकड़ों के मुताबिक़ अगर स्टॉक की बात करें तो ऑक्सीजन का कुल स्टॉक लगभग 58 हज़ार मीट्रिक टन का है, जिसमें से मेडिकल ऑक्सीजन के लिए ये मात्रा लगभग साढ़े 23 हज़ार मीट्रिक टन की हो जाती है.
ऑक्सीजन की मांग और आपूर्ति की क्या स्थिति है?
इसे जानने के लिए हम फिर से इन्हीं आँकड़ों का रूख करते हैं. देश को इस समय औसतन 4800 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन की ज़रूरत प्रतिदिन है. और आपूर्ति हो रही है लगभग 3700 मीट्रिक टन की. यानी अंतर लगभग 1100 मीट्रिक टन का है. अब थोड़ा गणित समझिए. देश में आपको ऑक्सीजन के उत्पादन में भी कम नहीं दिखाई दे रही है न ही ऑक्सीजन के भंडार में. जितनी मांग है, उससे कहीं ज़्यादा ऑक्सीजन का उत्पादन इस समय देश में किया जा रहा है. लेकिन आपूर्ति वाला पलड़ा हल्का है. ऐसा क्यों है? इसका कारण है हमारा ट्रांस्पोर्ट का नेटवर्क.
इसे ऐसे समझिए. जब उत्पादकों द्वारा ऑक्सीजन तैयार कर लिया जाता है, उस समय उन्हें बहुत विशालकाय टैंकरों में स्टोर कर लिया जाता है. इसके बाद इसे रीफ़िलिंग स्टेशनों तक भेजने के लिए ट्रकों का इस्तेमाल किया जाता है. ये ट्रक ख़ास क्रायोजेनिक ट्रक होते हैं, जिनके भीतर का तापमान बहुत कम होता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़, ऑक्सीजन प्लांट से वितरकों तक ऑक्सीजन पहुँचाने के लिए देश भर में केवल 1200 से 1500 क्रायोजेनिक ट्रक उपलब्ध हैं. ये संख्या कम है. इस संकट के हिसाब से बहुत कम. इतनी कम कि टाटा समूह ने जब आज ऐलान किया कि वो ऐसे 24 क्रायोजेनिक ट्रकों का आयात करेगा, तो नरेंद्र मोदी ने भी इस मुहिम की तारीफ़ की. लेकिन ज़मीन से सुनिए कि दिक़्क़त क्या है. ऑक्सीजन के सप्लायर अरविंद कुमार बताते हैं-
Embed
बात सिर्फ़ ऑक्सीजन के वितरण को लेकर नहीं है. बात सिलिंडर की भी है. सिलिंडर की भी क़िल्लत है. कई सप्लायर ये बताते है कि ऑक्सीजन आ जाने के बाद भी उन्हें स्टोर करने के लिए सिलिंडरों की क़िल्लत है. कई अग्रणी अस्पतालों में तो ख़ुद के ऑक्सीजन प्लांट लगाए गए हैं, लेकिन कई अस्पतालों में ऑक्सीजन रखने के लिए सिलिंडरों का इस्तेमाल किया जाता है. और क़िल्लत यहीं उपजती है. इफ़को समेत कई बड़ी कम्पनी ऑक्सीजन प्लांट से मेडिकल यूज के लिए ऑक्सीजन सप्लाई करने की बात करती हैं, लेकिन ज़मीन पर सिलिंडर की समस्या इससे नहीं सुलझती है.
लेकिन ऑक्सीजन की इतनी क़िल्लत क्यों हुई?
क्या सच में लोगों ऑक्सीजन की इतनी ज़रूरत है या लॉकडाउन की तर्ज़ पर पैनिक बाइंग की वजह से ये स्थितियां आ गयी हैं?
भारत सरकार की तैयारियों पर भी सवाल उठते हैं कि सरकार ने क्या कोरोना की पहली लहर के बाद सबक़ नहीं लिए? परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य मंत्रालय ने बीते दिनों ख़ुद ट्वीट करके जानकारी दी थी कि केंद्र सरकार द्वारा 162 ऑक्सीजन प्लांट सैंक्शन किए गए थे, जिसमें से सिर्फ़ 33 ऑक्सीजन प्लांट ही इंस्टॉल किए जा सके. सरकार ने ये भी कहा था कि अप्रैल 2021 के आख़िर तक और 59 प्लांट और मई 2021 के आख़िर तक 89 प्लांट इंस्टॉल किए जायेंगे. लेकिन अभी की क्राइसिस बड़ी है. कई अस्पतालों में कुछ घंटे का ऑक्सीजन बचा हुआ है.
देश इस समय केवल ऑक्सीजन की ही कमी से नहीं जूझ रहा है. ऐसा लग रहा है कि पूरा का पूरा मेडिकल सिस्टम ही ध्वस्त हो गया है. हर जगह से बेड्स, वेंटीलेटर्स, दवा, ऑक्सीजन की कमी की खबरें आ रही हैं. कहीं ऑक्सीजन मिल जा रहा है तो सिलेंडर नहीं मिल रहा, कहीं एंबुलेंस नहीं हैं तो कहीं वो वक्त पर पहुंच नहीं पा रही हैं. ट्विटर व्हाट्सअप, फेसबुक पूरा सोशल मीडिया मदद की गुहारों से पटा पड़ा है. लोग एक दूसरे की मदद के लिए खूब सारे नंबर्स शेयर कर रहे हैं, लिस्ट शेयर कर रहे हैं कि यहां ऑक्सीजन मिल रहा, यहां बेड मिल रहा. अब अगर लोग अपने स्तर पर इस तरह से डाटा इकट्ठा कर अलग-अलग शहरों की लिस्ट बना सकते हैं तो क्या ये काम राज्य सरकारें नहीं कर सकती हैं? डिजिटलाइजेशन का दंभ भरने वाली सरकारें आखिर क्यों ऐसी व्यवस्था नहीं बनातीं जहां पूरी पारदर्शिता के साथ ये बताया जाए कि किस अस्पताल में कितने बेड खाली हैं? किस जगह पर कौन सी दवा उपलब्ध है? सरकार के पास कितना स्टॉक है और ये कैसे लिया जा सकता है?
ऐप जो अस्पतालों में बेड की उपलब्धता के बारे में बताए
इस समय हमारा शहर, राज्य, देश बहुत गंभीर बीमारी से जूझ रहा है. और बीमारी के समय हमें कुछ भी छिपाना नहीं होता है. जो भी है सब साफ-साफ बताना होता है. ऐसा करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है. बहुत ही आसानी से एक वेबसाइट या ऐप तैयार किया जा सकता है. जहां पर जिलेवार अस्पतालों की संख्या, एम्बुलेंस, बेड, दवाइयों, प्लाज्मा और ऑक्सीजन की उपलब्धता के बारे में बताया जा सकता है. वहां ये सुविधा भी दी जा सकती है कि अगर कोई व्यक्ति डोनेट करना चाहता है तो रजिस्टर करे और डोनेट करे. इसे हर रोज अपडेट किया जा सकता है. सोचिए ऐसी सेंट्रलाइज़ व्यवस्था होती तो कैसा होता? लेकिन क्या वाकई ऐसा संभव है?
Arvind Kejriwal Gnctd Bill Passed

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल (फोटो-पीटीआई)

दिल्ली सरकार ने एक ऐसा ऐप तैयार किया है जो अस्पतालों में बेड की उपलब्धता के बारे में बताता है. लेकिन इस ऐप के नीचे काफी रिव्यू ऐसे हैं जिनके मुताबिक ये ऐप खाली बेड्स और वेंटीलेटरों की सही संख्या नहीं बताता. अधिकतर लोगों का कहना है कि सरकारी दावे गलत है और ये ऐप रियलटाइम सही आंकड़े नहीं दिखाता. ऐसा नहीं है कि पहले कोविड को लेकर ऐप नहीं बने हैं. आरोग्य सेतु ऐप भी बनाया गया था और फिर वैक्सीनेशन के लिए को-विन सिस्टम को भी तैयार किया गया था. लेकिन अब जब बेड से लेकर ऑक्सीजन तक के लिए मारामारी बची है तब सरकारें इस दिशा में कोई कदम नहीं उठा रहीं.
सभी को इलाज मिले, सभी को ऑक्सीजन मिले, सब स्वस्थ रहें. लल्लनटॉप और देश के बहुत सारे लोग इस प्रयास में लगे हुए हैं कि मदद का सिलसिला कहीं रुके नहीं. लेकिन सरकारों को ख़ुद को भी इस मुहिम में और ज़्यादा शामिल करना होगा. देश के ऑक्सीजन के तंत्र को थोड़ा और ग्राह्य बनाना होगा. ताकि और जिंदगियां बचाई जा सकें.

Advertisement

Advertisement

()