उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव में जीत के लिए राजनीतिक दल पूरा जोर लगारहे हैं. हर बार की तरह किसानों को साधने की कोशिश की जा रही है. सत्ताधारी बीजेपीने दावा किया है कि साल 2014 में केंद्र में उसकी सरकार बनने के बाद किसानों कीस्थिति में व्यापक परिवर्तन आया है और उनको लागत का उचित दाम मिल रहा है.यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी बीती 23 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्रीचौधरी चरण सिंह की जयंती के मौके पर एक सभा को संबोधित करते हुए कहाथा, ‘वैसे तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की घोषणा साल 1968 में हुई थी, लेकिन इसकोलागू करने का काम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया और साल 2018 से कृषि उपज कीलागत की तुलना में डेढ़ गुना MSP घोषित की जा रही है.’ तारीफ के पीछे का सच हालांकिपर्दे के पीछे मोदी सरकार के महिमामंडन की तस्वीर ऐसी नहीं है. हकीकत यह है कि योगीआदित्यनाथ और उनकी सरकार को स्पष्ट रूप से ये जानकारी है कि मौजूदा MSP राज्य कीकृषि लागत के हिसाब से पर्याप्त नहीं है और इसमें वृद्धि होनी चाहिए. खुद सरकारीअध्ययन द्वारा यह जानकारी जुटाए जाने के बावजूद चुनावी रैलियों में बीजेपी MSP मेंपर्याप्त वृद्धि होने का ढोल पीट रही है.द लल्लनटॉप ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत राज्य सरकार के उन गोपनीयदस्तावेजों को प्राप्त किया है, जिनमें राज्य में विभिन्न फसलों के वास्तविकउत्पादन लागत का जिक्र है. राज्य सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञों की एक समिति ने यहविस्तृत अध्ययन किया था. इसी को आधार बनाते हुए यूपी सरकार ने भारत सरकार के कृषिएवं किसान कल्याण मंत्रालय को एक पत्र लिखा था और MSP में वृद्धि की मांग की थी,लेकिन मोदी सरकार ने इसे सिरे से खारिज कर दिया. रबी फसलों की MSP की घोषणादेशव्यापी किसान आंदोलन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेटने आठ सितंबर 2021 को रबी विपणन सीजन (आरएमएस) 2022-23 के लिए रबी फसलों (गेहूं,जौ, चन, मसूर, सरसों) के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की घोषणाकी थी. हमेशा की तरह, सरकार ने इस बार भी इसे ‘ऐतिहासिक बढ़ोतरी’ करार दिया.हालांकि दस्तावेज बताते हैं कि देश का बड़ा कृषि राज्य और कुल गेहूं उत्पादन मेंसर्वाधिक 31.5 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाला उत्तर प्रदेश ही इस फैसले से खुश नहींथा. योगी सरकार ने केंद्र द्वारा घोषित इस MSP को लेकर आपत्ति दर्ज कराई थी औरकिसानों को उचित दाम दिलाने के लिए इसमें बढ़ोतरी की मांग की थी.उत्तर प्रदेश शासन के विशेष सचिव शत्रुन्जय कुमार सिंह ने कैबिनेट बैठक से पहले 25अगस्त 2021 को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव को एक गोपनीय पत्र लिखाथा. इसमें उन्होंने कहा था कि यूपी सरकार ने राज्य में कृषि लागत का अध्ययन करायाहै, जिसके मुताबिक गेहूं की MSP 2,735 रुपये प्रति क्विंटल होनी चाहिए.जबकि केंद्र सरकार ने इस बार गेहूं की MSP 2,015 रुपये प्रति क्विंटल तय की है.इसका मतलब ये है कि राज्य सरकार की सिफारिशें स्वीकार नहीं किए जाने से उत्तरप्रदेश के गेहूं किसानों को प्रति क्विंटल पर सीधे 720 रुपये का घाटा होगा.उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित और केंद्र द्वारा घोषित एमएसपी का विवरण.(स्रोत: आरटीआई)यूपी सरकार के अध्ययन के मुताबिक राज्य में गेहूं की उत्पादन लागत 1,656 रुपयेप्रति क्विंटल है. जबकि केंद्र का कहना है कि संपूर्ण भारत की प्रोजेक्टेड उत्पादनलागत (गेहूं) 1,518 रुपये प्रति क्विंटल है.राज्य सरकार ने जौ की MSP 2,400 रुपये, चने की 5,525 रुपये, मटर की 4,400 रुपये,मसूर की 5,350 रुपये और सरसों की MSP 5,400 रुपये प्रति क्विंटल घोषित करने की मांगकी थी.जबकि केंद्र ने जौ की MSP 1,635 रुपये, चने की 5,230 रुपये, मसूर की 5,500 रुपये औरलाही सरसों की MSP 5,050 रुपये प्रति क्विंटल घोषित कर रखी है. इसका मतलब यह हैकि अगर उत्तर प्रदेश के किसान केंद्र की MSP पर भी अपनी ऊपज बेचते हैं तो उन्होंनेप्रति क्विंटल जौ पर 765 रुपये, चने पर 295 रुपये और सरसों पर 350 रुपये का घाटाहोगा. इसमें मसूर को छोड़कर बाकी सभी फसलों के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वाराप्रस्तावित MSP केंद्र की तुलना में काफी अधिक है.इसे लेकर यूपी सरकार के विशेष सचिव ने केंद्र से MSP में बढ़ोतरी की गुजारिश करतेहुए कहा था, ‘प्रदेश की अधिकांश जनसंख्या कृषि एवं कृषि से संबंधित व्यवसाय परनिर्भर है. इसको ध्यान में रखते हुए प्रदेश सरकार के सुझाए मूल्यों के अनुसार रबीफसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किए जाने चाहिए, जिससे प्रदेश के किसानों कोउनकी फसलों के लाभकारी मूल्य प्राप्त हो सकेंगे.’ उन्होंने आगे कहा, ‘राज्यकी सिफारिशों के अनुरूप न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से किसानों को कृषिक्षेत्र से पलायन करने से भी रोका जा सकेगा. इसके साथ ही फसलों के उत्पादन मेंवृद्धि करते हुए किसानों की आय में भी वृद्धि की जा सकेगी.’ इसके साथ ही राज्यसरकार ने कई अन्य महत्वपूर्ण दलीलों का भी हवाला दिया था कि आखिर क्यों उनकीसिफारिश स्वीकार की जानी चाहिए. शत्रुन्जय ने बताया कि प्रदेश में 92.8 फीसदी किसानलघु एवं सीमांत श्रेणी के हैं, जिनके पास कुल जोत का लगभग 65.8 फीसदी कृषि क्षेत्रउपलब्ध है. राज्य में औसत जोतों का आकार मात्र 0.73 हेक्टेयर है, जिसमें सीमांतकृषकों के लिए यह मात्र 0.38 हेक्टेयर है. इनकी अन्न संग्रहण की क्षमता भी बहुत कमहै. उन्होंने कहा, 'जोतों का आकार कम होने के कारण इनकी संसाधन और कृषि निवेशों केउपयोग की क्षमता भी कम है. इसलिए किसान हित में किसानों को उनकी उपज का समुचितमूल्य मिलना आवश्यक है.' हालांकि केंद्र सरकार ने राज्य की इन गुजारिशों को सिरे सेखारिज कर दिया था और अपने अनुसार ही MSP की घोषणा की. दस्तावेजोंसे यह भी पता चलता है कि कैबिनेट के सामने यूपी सरकार की सिफारिशों को पेश किया गयाथा, लेकिन इसे खारिज करने की कोई वजह नहीं बताई गई है.राज्य की फसलों की उत्पादन लागत का अध्ययन करने के लिए उत्तर प्रदेश के कृषिसांख्यिकी एवं फसल बीमा विभाग के निदेशक ने सर्वे कराया था. बाद में MSP की सिफारिशकरने के लिए यूपी के कृषि विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर और कृषि अर्थशास्त्रियों केसाथ विस्तृत चर्चा भी की गई थी.इस मामले को लेकर हमने उत्तर प्रदेश सरकार में कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार औरकृषि निर्यात विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्रीराम चौहान से बात की.उन्होंने माना कि राज्य की कृषि लागत के हिसाब से यदि एमएसपी तय की जाती है, तो यहकिसानों के लिए उचित होगा.शुरु में श्रीराम चौहान ने ये जताने की कोशिश की उन्हें यूपी सरकार के इस पत्र केबारे में कोई जानकारी नहीं है. लेकिन जब उन्हें इसका प्रमाण दिया गया तो उन्होंनेकहा, 'लागत के आधार पर लाभकारी मूल्य देने के लिए एमएसपी तय की जाती है.इसमें अगर लागत और लाभ दोनों को ध्यान में रखा जाता है, तो ठीक रहता है. अगर केंद्रने यूपी सरकार की मांग के आधार पर बढ़ोतरी की होती तो यह बेहतर होता, हालांकिएमएसपी में वृद्धि ठीक हुई है.' यह पूछे जाने पर कि क्या मौजूदा एमएसपी के आधार परयूपी के किसानों को नुकसान हो सकता है, श्रीराम चौहान ने कहा, 'उत्तर प्रदेश सरकारइस पर जरूर विचार करेगी. राज्यों के पास बहुत विशेषाधिकार होते हैं, उसी में से कोईरास्ता निकाला जाएगा.' कैसे निकाली जाती है उत्पादन लागत? फसलों के उत्पादन लागतमूल्य, उनकी उपज में शामिल मानव श्रम, पशु श्रम, मशीन श्रम, बीज, सिंचाई, उर्वरक,भूमि का किराया और कृषि निवेश आदि पर किए गए व्यय पर निर्भर करते हैं. प्रख्यातकृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन की अगुवाई में 'किसानों पर राष्ट्रीय आयोग' नेदिसंबर 2004 से अक्टूबर 2006 के बीच कुल पांच रिपोर्ट्सकेंद्र सरकार को सौंपी थीं. इनमें उत्पादन लागत का आकलन करने के लिए विस्तृत औरवैज्ञानिक फार्मूला दिया गया था.लेकिन केंद्रीय कृषि मंत्रालय अपनी संस्था के जरिये कराए गए विभिन्न उत्पादन लागतआकलन में से कम उत्पादन लागत के आधार पर MSP तय करता है, जो कि केंद्र द्वारास्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने पर बड़ा सवाल खड़ा करता है.आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, किसानों को ‘सी2 (C2) लागत’ पर डेढ़ गुना दाम मिलनाचाहिए. इसमें खेती की सभी लागतों जैसे कि उर्वरक, पानी, बीज के मूल्य के साथ-साथपरिवार की मजदूरी, भूमि का किराया और ब्याज वगैरह भी शामिल किया जाता है.लेकिन केंद्र सरकार ‘ए2+एफएल (A2+FL) लागत’ के आधार पर डेढ़ गुना MSP दे रही है,जिसमें भूमि का किराया और ब्याज मूल्य शामिल नहीं होता है. चूंकि ए2+एफएल लागत, सी2लागत से काफी कम होती है, इसलिए इसके आधार पर तय की गई MSP भी कम होती है.उत्तर प्रदेश सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक अगर सिर्फ गेहूं की उत्पादन लागत को देखाजाए तो इसमें पशु श्रम में 100 फीसदी, बीज राशि में 17.67 फीसदी और भूमि किराया में24.13 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.फसलों की एमएसपी बढ़ाने के लिए यूपी सरकार द्वारा की गई सिफारिश.केंद्रीय कृषि मंत्रालय की संस्था ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी)’ कीसिफारिशों के आधार पर भारत सरकार हर साल खरीफ और रबी सीजन की फसलों की घोषणा करतीहै. सीएसीपी को फसलों की उत्पादन लागत की गणना करने और देश में कृषि उपजों केउत्पादन, खरीद-बिक्री इत्यादि पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने की जिम्मेदारी मिली हुईहै.सीएसीपी सभी राज्यों की फसल लागत के औसत के आधार पर MSP की सिफारिश करता है. इसकेकारण कुछ राज्यों के किसानों को तो ठीक-ठाक दाम मिल जाता है, लेकिन अन्य कई राज्योंके किसानों को उत्पादन लागत के बराबर भी MSP नहीं मिलता है.वहीं, राज्य सरकारें अपने यहां की विशेष स्थिति के आधार पर फसल लागत का आकलन करतीहैं, जो कि ज्यादातर समय केंद्र सरकार के आकलन से काफी अधिक रहता है.