POCSO ऐक्ट से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक टिप्पणी और फैसला हरतरफ चर्चा में है. खबरों के मुताबिक मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्टने कहा कि 'ओरल सेक्स अति गंभीर श्रेणी वाला अपराध नहीं' है. इसके अलावा हाई कोर्टने मामले से जुड़े दोषी की सजा भी कम कर दी. अब हर तरफ हो-हल्ला है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आखिर इस तरह का फैसला और स्टेटमेंट क्यों दिया.लोगों ने क्या कहा?इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले की खबर आई तो लोग भड़क गए. अदालत पर तंज कसते हुएसोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं देने लगे. Grouchy Maxx नाम के यूज़र ने लिखा, भारतमें रेप नहीं होते.Rapes do not happen in Bharat. https://t.co/urutf2Agpc— Grouchy Maxx (@slowgrowl) November 23, 2021 उदय नाम के यूज़र लिखते हैं. ऐसाफ़ैसला सुनाने पर जजों को शर्म करनी चाहिए. Shame on those milords for such stupidjudgement https://t.co/lwbl8ZdoCw — Uday Daud (@daud_uday) November 23, 2021 वीमूव नाम के ट्विटर हैंडल से कहा गया, हमें न्याय व्यवस्था की ज़रूरत नहीं.We don't need a judiciary https://t.co/Q2HAP9vfFP— we move (@Ocreativitigang) November 23, 2021 वहीं जोया ने लिखा, ये भयावह है.चूंकि ये 'बलात्कार' नहीं था, सो कम गंभीर हो गया? ऐसे अपराधियों से उत्पीड़ितबच्चों को बहुत ज्यादा मानसिक आघात पहुंचता है. क्या कोर्ट को इस बारे में नहींसोचना चाहिए था?This is appalling. It hints to the mindset where all dignity and honour isattached to the private parts. Since it wasn't 'rape' rape, it was less serious?The trauma, the mental scarring of children who are sexually assaulted by thesecriminals isn't worth any consideration? https://t.co/246DTZuX0t— Zoya Rasul (@zoyarasul) November 23, 2021पूरा मामला क्या है?इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बच्चों को यौन हमलों से बचाने वाले कानून यानी POCSO ऐक्ट कीधाराओं को क्लैरिफाई करते हुए ये बात कही है. इंडिया लीगल लाइव की ख़बर के अनुसारमामला 26 मार्च 2016 को हुई एक घटना से जुड़ा है. उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के एकइलाके चिरगांव में सोनू कुशवाहा नाम का शख्स एक लड़के को 20 रुपये का लालच देकरमंदिर ले गया. लड़के की उम्र उस समय केवल 10 साल थी. सोनू ने पैसों का लालच देकरलड़के को ओरल सेक्स करने को कहा. ऐसा करने के बाद सोनू ने लड़के को धमकी भी दी किवो इस बारे में किसी को ना बताए. लेकिन लड़के के पिता ने 20 रुपये को लेकर पूछताछकी तो पीड़ित ने सब बता दिया. इसके बाद पिता ने पुलिस में कंप्लेंट की और सोनूकुशवाहा के खिलाफ आईपीसी की धारा 377 और 506 के अलावा POCSO ऐक्ट की धारा 3/4 केतहत मामला दर्ज कर लिया गया. झांसी की एक अदालत में मामला चला और सोनू को दोषी पायागया. 24 अगस्त 2018 को उसे पॉक्सो ऐक्ट की धारा 6 के तहत अलग से 10 साल के कठोरकारावास की सज़ा सुनाई गई. 5000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. इसके खिलाफ सोनूहाई कोर्ट पहुंच गया. अब वहां क्या हुआ, ये बताते हैं.हाई कोर्ट ने कहा क्या?हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान ये सामने आया कि पुलिस ने आईपीसी के अलावा पॉक्सोऐक्ट की धारा 3/4 के तहत सबूत इकट्ठा किए थे. लेकिन झांसी में सुनवाई के दौरानएडिशनल सेशन जज ने सोनू पर पॉक्सो की धारा 5/6 लगा दी थी. पॉक्सो ऐक्ट की इस धारामें ही 'अति गंभीर यौन हमलों' की बात कही गई है. अंग्रेजी में इन्हें 'अग्रेवेटिडसेक्शुअल ऐक्ट' लिखा गया है, जिनमें कम से कम 20 साल की सजा तो होती ही है. जबकिधारा 4 में 'पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट' का जिक्र है. यानी जब कोई शख्स अपना लिंगबच्चे के मुंह में प्रवेश कराता या डालता है या ऐसा करने की कोशिश करता है, तब येधारा लगाई जाती है. पुलिस ने इसी धारा के तहत सोनू पर केस दर्ज किया था. और इसमेंकम से कम पनिशमेंट है 10 साल की. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धाराओं में अंतर बताते हुएकहा कि इस केस में 'पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट' हुआ, ना कि 'अग्रेवेटिड सेक्शुअलअसॉल्ट'. सोनू कुशवाहा के वकील ने अदालत को बताया कि दोषी को गलत धारा के तहत सजादी गई है. उन्होंने कहा कि धारा 6 में 'aggravated sexual assault' की बात कही गईहै, जबकि उनके क्लाइंट ने 'penetrative sexual assault' किया. इसलिए उसे धारा 4 केतहत सजा सुनाई जानी चाहिए, ना कि धारा 6 के तहत. वकील ने कोर्ट को ये भी बताया किपुलिस के सबूत भी धारा 4 से संबंधित हैं. इंडिया लीगल लाइव और बार एंड बेंच जैसीकानूनी मामलों से जुड़ी वेबसाइट्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट ने पुलिस की जांचको सही पाया और माना कि सोनू ने वाकई में अपराध किया है, लेकिन उसका अपराध POCSOऐक्ट के सेक्शन 4 के अंतर्गत आता है, ना कि धारा 6 के. इसी कारण कोर्ट ने सोनू कीसजा कम कर दी. हालांकि पीड़ित की उम्र को देखते हुए कई लोगों का कहना है कि हाईकोर्ट का ये निर्णय सही नहीं है. जानकार कह रहे हैं कि ये मामला वाकई में पॉक्सो कीधारा 5/6 से जुड़ा है, क्योंकि अपराध के समय पीड़ित की उम्र 10 साल थी. गौरतलब हैकि पॉक्सो ऐक्ट की धारा 5 के मुताबिक 12 साल से कम उम्र के बच्चों का यौन उत्पीड़नगंभीर अपराध की श्रेणी में आता है, जबकि उच्च न्यायालय ने धारा 4 के तहत फैसला सुनादिया.