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अयोध्या: रामलला विराजमान के लिए बिना थके केस लड़ रहे 92 साल के वकील की पूरी कहानी

'मरने से पहले मैं ये केस ख़त्म करना चाहता हूं.'

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17 अक्तूबर 2019 (अपडेटेड: 17 अक्तूबर 2019, 03:45 PM IST)
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(तस्वीर साभार: रेडिट)
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बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद की सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई 16 अक्टूबर, 2019 को पूरी हो गई. 16 अक्टूबर सुनवाई का 40वां और आखिरी दिन था. पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने इस मामले की सुनवाई की. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं. उससे पहले फैसला आ जाएगा. इस पूरे मामले में तीन बड़े पक्ष हैं- राम जन्मभूमि न्यास, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड और निर्मोही अखाड़ा.
सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड की तरफ से राजीव धवन और रामलला विराजमान की तरफ से के पाराशरण इस केस में दलीलें दे रहे हैं. राजीव धवन का नाम मीडिया में काफी हाईलाईट हुआ जब उन्होंने कोर्ट में मंदिर से जुड़े नक़्शे और किताब के पन्ने फाड़ दिए.
इनके सामने रामलला विराजमान की तरफ से केस लड़ रहे के पाराशरण पर सबकी आंखें जमी हुई हैं. जबसे इस मामले की सुनवाई शुरू हुई, तभी से. हिन्दू ग्रंथों की जानकारी इनकी बेहद तगड़ी है. वकीलों के खानदान से आते हैं. और पिछले तीन साल में इनके दो केस सबसे ज्यादा चर्चित रहे हैं. एक तो सबरीमाला मंदिर मामला. दूसरा राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामला.  सबरीमाला में ये नायर सर्विस सोसाइटी की तरफ से वकील बने थे. मंदिर में महिलाओं के पूजा करने के अधिकार को लेकर सुनवाई चली थी. पाराशरण ने इसके विरोध में तर्क दिए थे. यानी महिलाओं के ऊपर वहां पूजा करने को लेकर जो बैन लगा था, ये उसे डिफेंड कर रहे थे. जब बहस चल रही थी, तब उन्होंने अयप्पा के ब्रह्मचारी होने की दलील दी थी, वो भी सुन्दरकाण्ड से.
के पाराशरण के बेटे मोहन पाराशरण भी सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं. (तस्वीर साभार: बार एंड बेंच )
के पाराशरण के बेटे मोहन पाराशरण भी सॉलिसिटर जनरल  और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया रह चुके हैं. (तस्वीर साभार: बार एंड बेंच )

1927 में तमिलनाडु के श्रीरंगम में उनका जन्म हुआ. इनके पिता भी वकील थे. इनके तीनों बेटे भी वकील हैं. पाराशरण 1958 से प्रैक्टिस कर रहे हैं. तब से लेकर अब तक कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन पाराशरण उनके भरोसेमंद वकील बने रहे. कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं. 76 में तमिलनाडु के एडवोकेट जनरल रहे. उस समय वहां राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था. 2003 में NDA सरकार थी जब उन्हें पद्म भूषण दिया गया, और 2011 में  UPA I सत्ता में थी जब पद्म विभूषण दिया गया उन्हें.
भारत के सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया रहे. उसके बाद अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया भी बने. इनका ग्राविटास (महत्त्व/गाम्भीर्य) इसी बात से समझा जा सकता है कि मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके संजय किशन कॉल ने इनको इंडियन बार का पितामह कहा था. कि वो धर्म से समझौता किए बिना कानून में अपना योगदान देते आ रहे हैं.
इस मामले में भी जब के पाराशरण अपनी बहस के तर्क पेश कर रहे थे, तो उनसे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने पूछा, क्या आप बैठ कर बहस करना चाहेंगे? इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार इस पर पाराशरण ने कहा,
इट्स ओके. आप लोग बेहद दयालु हैं. बार की परंपरा रही है खड़े होकर बहस करने की. मुझे परंपरा का ध्यान रखना है.
इस पूरी सुनवाई के दौरान के पाराशरण ने कई दलीलें ऐसी दीं जिन्होंने ध्यान खींचा. सबसे पहले तो जस्टिस भूषण ने ही उनसे पूछा कि जन्मस्थान को एक व्यक्ति की तरह कैसे जगह दी जा सकती है, और मूर्तियों के अलावा बाकी की जो चीजें हैं, उनके कानूनी अधिकार कैसे तय होंगे. इस पर पाराशरण ने ऋग्वेद का उदाहरण दिया जहां सूर्य को भगवान माना जाता है लेकिन उनकी कोई मूर्ति नहीं है. मगर देवता होने के नाते उन पर कानून लागू होते हैं. पाराशरण ने ये भी कहा कि हिन्दू धर्म में मूर्ति का होना कोई आवश्यक नहीं है, क्योंकि हिन्दू किसी ठोस रूप में भगवान की पूजा नहीं करते. बल्कि उनका मानना है कि उनका कोई रूप नहीं होता.
अयोध्या में रामलला की मूर्ति.
अयोध्या में रामलला की मूर्ति.

मंगलवार यानी 16 अक्टूबर को पाराशरण ने सुनवाई के दौरान दलील दी,
मुस्लिम किसी भी दूसरी मस्जिद में नमाज़ पढ़ सकते हैं. अयोध्या में ही 55-60 मस्जिदें हैं. लेकिन हिन्दुओं के लिए, ये भगवान राम का जन्मस्थान है. हम उनके जन्म की जगह तो नहीं बदल सकते.
बेंच ने ये पूछा, कि वो कहते हैं कि एक बार मस्जिद बनी, तो हमेशा मस्जिद ही रहेगी. क्या आप इसका समर्थन करते हैं?
पाराशरण ने कहा,
'नहीं, मैं इसका समर्थन नहीं करता, मेरा मानना है कि एक बार मंदिर बना, तो मंदिर ही रहेगा' 
इस सुनवाई के दौरान जब जजों से और समय मांगा गया तो चीफ जस्टिस गोगोई ने कहा,  अब बस बहुत हुआ. पांच बजे बेंच उठ जाएगी.
अयोध्या मामले में लगातार चालीस दिनों तक मौखिक सुनवाई हुई. ये दूसरी सबसे लम्बी हियरिंग है, केशवानंद भारती केस के बाद. उसकी हियरिंग 68 दिन चली थी. तीसरे नम्बर पर आधार केस है, जिसकी सुनवाई 38 दिन चली थी.
पांच जजों की बेंच – चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, एसए बोबड़े, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नज़ीर – हफ्ते में पांचों दिन अयोध्या मामले मामले की सुनवाई कर रही थी. इस मामले में साल 2010 में दिए फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे 2.77 एकड़ के भूभाग को तीन पार्टियों – रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़े और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर-बराबर आवंटित कर दिया था. हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी थी. 16 अक्टूबर की सुनवाई आखिरी थी.
के पाराशरण ने इस केस की बाबत कहा था,
‘मरने से पहले मेरी आखिरी इच्छा है कि मैं ये केस ख़त्म कर दूं’.



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