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सरकार के पास 14 साल का सबसे कम गेहूं स्टॉक, अब कैसे भरेगा गरीबों का पेट?

बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना है, जो कि कोरोना महामारी के दौरान लाई गई थी. इसके तहत पिछले दो सालों में सेंट्रल पूल से करीब 324 लाख टन गेहूं निकाला गया था. मौजूदा स्टॉक में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के लिए पर्याप्त गेहूं नहीं है.

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10 जून 2022 (अपडेटेड: 10 जून 2022, 07:44 PM IST)
India's Wheat Procurement
लू की वजह से इस बार गेहूं के उत्पादन में कमी आई है. (फोटो: पीटीआई)
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देश के गेहूं भंडार में काफी ज्यादा गिरावट आई है. आलम ये है कि पिछले 14 सालों में पहली बार इतनी कमी देखी गई है. भारतीय खाद्य निगम (FCI) के आंकड़ों के मुताबिक, एक जून तक सेंट्रल पूल में कुल 311.42 लाख टन गेहूं का स्टॉक बचा हुआ था. इससे पहले साल 2008 में एक जून तक गेहूं का स्टॉक गिरकर 241.23 लाख टन पहुंच गया था. 

पिछले साल एक जून को सेंट्रल पूल में 602.91 लाख टन गेहूं पड़ा हुआ था, जो कि मौजूदा स्थिति के मुकाबले 48 फीसदी अधिक था. इससे पहले इसी तारीख को साल 2020 में सेंट्रल पूल में 558.25 लाख टन, साल 2019 में 465.60 लाख टन, साल 2018 में 437.55 लाख टन और साल 2017 में 334.40 लाख टन गेहूं का स्टॉक बचा हुआ था.

हालांकि, भले ही देश के गेहूं स्टॉक में कमी आई है, लेकिन फिर भी यह बफर स्टॉक से ज्यादा है. नियम के मुताबिक, बफर स्टॉक को बनाए रखने के लिए एक अप्रैल तक 44.60 लाख टन गेहूं का स्टॉक होना चाहिए. इसके अलावा इसकी मात्रा एक जुलाई को 245.80 लाख टन, एक अक्टूबर को 175.20 लाख टन और एक जनवरी 108 लाख टन होनी चाहिए. 

साथ ही साथ, इन सभी चार तारीखों पर 30 लाख टन के रणनीतिक भंडार को बनाए रखना जरूरी होता है.

क्यों होता है बफर स्टॉक?

बफर स्टॉक खाद्यान्न की उस मात्रा को कहते हैं, जो देश की सभी तरह की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए रखा जाता है. इसमें से एक हिस्से का इस्तेमाल सरकार द्वारा चलाई जा रही तमाम योजनाओं- जैसे कि मिडे-डे मील, खाद्य सुरक्षा योजना इत्यादि के तहत राशन की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है.

वहीं बफर स्टॉक का एक हिस्सा प्राकृतिक आपदा या उत्पादन में अचानक से आई किसी कमी को पूरा करने में इस्तेमाल किया जाता है. रणनीतिक भंडार इसलिए रखा जाता है, ताकि रक्षा संबंधी खाद्य जरूरतों को पूरा किया जा सके.

15 सालों में सबसे कम गेहूं खरीद

केंद्र सरकार ने मौजूदा सत्र 2022-23 में 444 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा था. लेकिन इसमें सिर्फ 187 लाख टन की खरीद ही हो पाई है, जो केंद्र सरकार के लक्ष्य के मुकाबले करीब 58 फीसदी कम है. इतना ही नहीं, यह पिछले 15 सालों में सबसे कम सरकारी खरीद है. इससे पहले 2007-08 में सबसे कम 111.28 लाख टन गेहूं की खरीद हुई थी.

पिछले साल (खरीद सत्र 2021-22) केंद्र सरकार ने 433.44 लाख टन गेहूं खरीदा था, जो कि अब तक का सर्वाधिक है. इससे पहले सरकार ने 2020-21 में 389.92 लाख टन, 2019-20 में 341.92 लाख टन, 2018-19 में 357.95 लाख टन और 2017-18 में 308.24 लाख टन गेहूं खरीदा था.

देश में गेहूं के उत्पादन में इस बार काफी कमी आई है. (फोटो: PTI)

मौजूदा सत्र में जितनी खरीद हुई है, उसमें से सबसे ज्यादा पंजाब से 96 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है. दूसरे नंबर पर हरियाणा है, जहां से 46 लाख टन और मध्य प्रदेश से करीब 42 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है. देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश से सिर्फ तीन लाख टन गेहूं ही खरीदा जा सका है.

गेहूं के स्टॉक में गिरावट क्यों?

गेहूं के स्टॉक में गिरावट आने की एक बड़ी वजह उत्पादन में कमी बताई जा रही है. 

जानकारों का कहना है कि हीटवेव यानी कि लू के कारण इस बार गेहूं का उत्पादन कम हुआ है. कृषि मंत्रालय के लेटेस्ट आंकड़ों के मुताबिक साल 2021-22 में देश भर में 10 करोड़ 64 लाख टन गेहूं उत्पादन का अनुमान लगाया गया. इससे पहले मंत्रालय ने 11 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का अनुमान लगाया था, लेकिन हीटवेव के बाद उन्हें इसे कम करना पड़ा है.

पिछले साल वित्त वर्ष 2020-21 में 10 करोड़ 95 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ था, जो कि मौजूदा अनुमान के मुकाबले तीन फीसदी अधिक है.

यूक्रेन-रूस युद्ध का पेच

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध की भी इसमें बड़ी भूमिका है. ये दोनों देश बड़े गेहूं उत्पादक हैं और दुनिया के कुल गेहूं निर्यात में इनकी हिस्सेदारी 28 फीसदी से अधिक है. लेकिन इनके बीच कई महीनों से चल रही निरंतर जंग ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की मांग को काफी बढ़ा दिया. नतीजा ये हुआ कि दूसरे देशों को निर्यात करने का मौका मिला और भारतीय निर्यातकों ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई.

किसानों ने सरकार के बजाय प्राइवेट खरीददारों को गेहूं बेचा, क्योंकि वे सरकारी एमएसपी से अधिक दाम दे रहे थे. लेकिन इन सबके बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम में बढ़ोतरी और विदेशों में गेहूं बेचने के चलते भारत के खुदरा बाजार में भी गेहूं के दाम बढ़ने लगे. इसके चलते आटे के दाम में भी काफी बढ़ोतरी हुई. 

सरकार पर दबाव बढ़ने लगा कि वो महंगाई पर काबू लाए और आनन-फानन में सरकार ने 13 मई को अचानक से गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी.

रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग को सौ दिन से अधिक का समय बीत चुका है. (फोटो: AP)

केंद्र सरकार ने दलील दी कि इससे घरेलू बाजार में गेहूं की उपलब्धता में बढ़ोतरी होगी और इस तरह मूल्यों में कमी आएगी. हालांकि, यह फैसला किसानों को नाराज करने वाला था, क्योंकि इसके कारण उन्हें कम दाम मिलने लगे. जब किसानों और किसान संगठनों ने नाराजगी जाहिर की, तो केंद्र ने गेहूं की सरकारी खरीद की तारीख बढ़ाकर 31 मई 2022 कर दी. लेकिन इसके बावजूद पर्याप्त सरकारी खरीद नहीं हो पाई है.

वैसे भारत गेहूं का बहुत बड़ा निर्यातक नहीं है. पिछले वित्त वर्ष में, भारत ने 75 लाख टन से अधिक गेहूं का रिकॉर्ड निर्यात किया था.

आगे क्या है रास्ता?

गेहूं का कम उत्पादन होने, सरकारी खरीद में कमी आने और बाजार में बढ़ती कीमतों ने सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है. मौजूदा वित्त वर्ष 2022-23 में सरकार के पास कुल 377.18 लाख टन गेहूं इकट्ठा हुआ है, जिसमें से 187 लाख टन गेहूं इस बार खरीदा गया है और करीब 190 लाख टन पिछले साल का बचा हुआ गेहूं है.

सरकार को खाद्य सुरक्षा योजना, मिड-डे मील योजना और अन्य रेगुलर कल्याणकारी योजना के तहत खाद्यान्न आपूर्ति के लिए करीब 260 लाख टन गेहूं की जरूरत होती है. इसकी तो पूर्ति हो जाएगी.

लेकिन बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना है, जो कोरोना महामारी के दौरान लाई गई थी. इसके तहत पिछले दो सालों में सेंट्रल पूल से करीब 324 लाख टन गेहूं निकाला गया. इस योजना के तहत वित्त वर्ष 2020-21 में 103 लाख टन और 2021-22 में 199 लाख टन गेहूं निकाला गया था.

इस तरह से ये साफ है कि मौजूदा स्टॉक में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के लिए पर्याप्त गेहूं नहीं है. यही वजह है कि सरकार ने इस साल अप्रैल से सितंबर तक इस योजना के तहत आवंटन को 109 लाख टन से घटाकर 54 लाख टन कर दिया है.

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना कोरोना महामारी के दौरान लाई गई थी. (फोटो: PTI)

लेकिन, अगर मौजूदा भंडार को देखें, तो इस जरूरत को भी पूरा करना आसान नहीं है. इतना ही नहीं, अक्टूबर महीने के बाद जब गेहूं की कमी होने लगती है, तो बाजार में दाम बढ़ने से रोकने के लिए सरकार को अपने स्टॉक से बाजार में गेहूं उतारना होता है और आटे के लिए मिलर को गेहूं देना होता है.

जानकारों का कहना है कि भारत को साल 2006-07 और 2007-08 जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, जब गेहूं के दाम काफी बढ़ गए थे और घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारत को गेहूं आयात करना पड़ा था.

सरकार के पास एक रास्ता और है. वो यह कि गेहूं की मांग को चावल की आपूर्ति के जरिए पूरा किया जा सकता है. एक जून तक सेंट्रल पूल में करीब 497 लाख टन चावल का स्टॉक था, जो कि 136 लाख टन के बफर स्टॉक के मुकाबले करीब चार गुना अधिक है. अगर आगामी महीनों में मानसून अच्छा रहता है, तो धान का बंपर उत्पादन होने की उम्मीद जताई जा रही है.

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