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लॉकडाउन में पूरी सैलरी देने के केंद्र के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है?

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हुई मामले की सुनवाई.

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4 जून 2020 (अपडेटेड: 4 जून 2020, 04:56 PM IST)
लॉकडाउन में आरबीआई की तरफ से दिए गए लोन मोरेटोरियम को आगे बढ़ाने और ब्याज में छूट देने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. (फाइल फोटो)
लॉकडाउन में आरबीआई की तरफ से दिए गए लोन मोरेटोरियम को आगे बढ़ाने और ब्याज में छूट देने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. (फाइल फोटो)
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कोरोना वायरस. इसकी वजह से देश में लॉकडाउन लगा. 25 मार्च से. सब कुछ बंद हो गया. इस बीच 29 मार्च को केंद्र ने एक नोटिफिकेशन जारी किया. कंपनियों से कहा कि उन्हें अपने कर्मचारियों को लॉकडाउन के दौरान पूरी सैलरी देनी होगी. कुछ कंपनियों ने केंद्र के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. इस मामले में 4 जून को सुनवाई हुई. कोर्ट ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान अपने कर्मचारियों को पूरी सैलरी नहीं देने वाली कंपनियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी. हालांकि कोर्ट ने अपना फैसला नहीं सुनाया है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट 12 जून को फैसला देगा.
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई
जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये मामले की सुनवाई की. केंद्र सरकार ने मार्च में नोटिफिकेशन जारी किया था. कहा गया था कि कोई भी प्राइवेट कंपनी लॉकडाउन के दौरान अपने कर्मचारियों का वेतन नहीं काटेगी. उन्हें पूरा वेतन देगी. सुनवाई के दौरान गृह मंत्रालय की ओर से कहा गया कि 29 मार्च का नोटिफिकेशन तत्कालीन प्रकृति का था और वह 54 दिनों के लिए था.
केंद्र सरकार ने कहा कि मज़दूरों को पूरा वेतन देने का आदेश जारी करना ज़रूरी था. मज़दूर आर्थिक रूप से समाज के निचले तबके में हैं. बिना औद्योगिक गतिविधि के उन्हें पैसा मिलने में दिक्कत न हो, इसका ध्यान रखा गया. अब गतिविधियों की इजाज़त दे दी गई है. 17 मई से उस आदेश को वापस ले लिया गया है.
Untitled Design (9) लॉकडाउन के बाद देश के कई शहरों से मजदूर अपने घरों को लौटने को मजबूर हो गए थे. (Photo: PTI)

'54 दिनों का पूरा वेतन नहीं दे सकते'
याचिका दायर करने वाली कंपनियां केंद्र की इस दलील से संतुष्ट नहीं थीं. उन्होंने कहा कि 29 मार्च से 17 मई के बीच 54 दिनों का पूरा वेतन नहीं दे सकते.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि केंद्र सरकार का नोटिफिकेशन कहता है कि 100 फीसदी सैलरी देनी होगी. सवाल ये है कि क्या केंद्र सरकार के पास अधिकार है कि 100 फीसदी सैलरी का आदेश दे और ऐसा नहीं करने पर कार्रवाई कर सकें? जस्टिस कौल ने कहा कि सरकार ने नोटिफिकेशन जारी करने के लिए इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट का इस्तेमाल नहीं किया. इसके तहत कर्मचारियों को काम नहीं होने पर 50 फीसदी तक मुआवजा दिए जाने का प्रावधान है. लेकिन गृह मंत्रालय ने 100 फीसदी देने को कहा था. अटॉर्नी जनरल ने कहा कि केंद्र सरकार ने जो भी किया था, वह मानवीय पहलू को देखते हुए किया.
'डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत निर्देश'
केंद्र ने 29 मार्च के नोटिफिकेशन को सही बताया. कहा कि पूरी सैलरी नहीं देने वाली कंपनियों को कोर्ट के सामने अपनी बैलेंसशीट पेश करने का निर्देश दिया जाना चाहिए. सरकार का फैसला डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत संविधान के दायरे में था. हालांकि केंद्र ने ये भी कहा कि अगर उद्योग और मज़दूर रकम के भुगतान पर आपस में कोई समझौता कर सकते हैं, तो इस पर सरकार आपत्ति नहीं करेगी.
जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि एक तरफ आप मज़दूरों को पूरा पैसा दिलवाने की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ मालिक और मज़दूरों में आपसी समझौते की बात कर रहे हैं. ठीक है आर्थिक गतिविधियों का पूरी तरह शुरू हो जाना जरूरी है, लेकिन इसमें सरकार की क्या भूमिका होगी? उसे दोनों पक्षों में संतुलन के लिए कुछ करना चाहिए.
कंपनियों ने कहा कि एम्प्लाई स्टेट इंश्योरेंस यानी कर्मचारी राज्य बीमा खाते में 80 से 90 हजार करोड़ रुपए हैं. सरकार चाहती तो 30 हजार करोड़ रुपए खर्च कर पूरे देश के कर्मचारियों को इस अवधि का वेतन दे सकती थी.
इस दलील पर केंद्र की ओर से कहा गया कि कर्मचारी राज्य बीमा के खाते में जमा पैसों को कहीं और ट्रांसफर नहीं किया जा सकता है. विशेष परिस्थितियों में अगर कोई कर्मचारी चाहे, तो उसमें से पैसे ले सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है. 12 जून को इस बारे में फैसला सुना सकता है.


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