अगर आपको ये पता चले कि मोदी सरकार आपके बैंक अकाउंट में हर महीने पैसा डाल देगी तोसुन के कैसा लगेगा? ये पैसे सैलरी के तौर पर आएं तो? अगर आप पैसे नहीं कमा रहे हैंतो आपको सबसे पहले मिलेगा. कैसा लगा? ये मजाक नहीं, सीरियस मैटर है.इस स्कीम की आजकल बहुत जोरों से चर्चा है. इसे 'यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) स्कीम'कहा जाता है. कहा जा रहा है कि सरकार बजट सेशन में इसकी घोषणा कर सकती है. बीजेपीवाले फ़ौरन सक्रिय भी हो गए हैं. इसका प्रचार भी करना शुरू कर दिया है. ये चुनावआचार संहिता के दायरे में कितना आता है, ये बाद की बात है. यूपी बीजेपी का येपोस्टर देखिए-पोस्टर- यूपी बीजेपी के फेसबुक पेज सेसरकार को ये प्रपोजल एक ब्रिटिश प्रोफेसर गाए स्टैंडिंग ने दिया है. यूनिवर्सलबेसिक इनकम स्कीम इसी ब्रिटिश प्रोफ़ेसर के दिमाग की उपज है. प्रोफेसर का मानना हैकि दुनिया में हर इंसान को एक बेसिक इनकम मिलनी चाहिए, फिर चाहे वो काम करें या नाकरें. हर महीने खाते में एक तय रकम आए.गाए स्टैंडिंगतुरंत ही कांग्रेस समेत दूसरी कई पार्टियों ने चुनाव आयोग में अर्जी दे दी कि बजटमें इस योजना की घोषणा कर के बीजेपी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में फायदाउठा सकती है. मुफ्त के पैसे किसको अच्छे नहीं लगेंगे? वोट भी तो बढ़ जाएंगे.पर क्या है ये यूनिवर्सल बेसिक इनकम ?नोटबंदी के बाद बहुत से लोगों ने तर्क दिए कि ये फैसला आर्थिक समानता की ओर लेजाएगा. ऐसा हो रहा है या नहीं, ये अलग बहस है. लेकिन यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीमआर्थिक समानता की ओर ले जा सकती है.ये एक सोशल सिक्योरिटी स्कीम है. इसमें हर इंसान को महीना, पंद्रह दिन, तीन महीनाकिसी भी फिक्स समय में एक फिक्स पैसा मिलेगा. इसके लिए किसी तरह की कोई शर्त नहींरखी जाती. यानी आपके पास रोजगार हो या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. इसे मार्केटसोशलिज्म का भी एक रूप माना जाता है. इस तरह की स्कीम बहुत पहले से चर्चा मेंहै. इस तरह का प्रपोजल 1795 में थॉमस पेन के पैम्फलेट Agrarian Justice में मिलताहै. 1986 से पहले इसके लिए सोशल डिविडेंड जैसे शब्द भी इस्तेमाल किये जाते थे. इसकेबाद ''बेसिक इनकम'' शब्द पॉपुलर हो गया.इंडिया में ये पहले आजमाया जा चुका हैइंडिया में 2011 में UNICEF और Self Employed Women's Association (SEWA) ने मध्यप्रदेश के कुछ गांवों में इसके प्रयोग के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया था. उसमेंहर एक एडल्ट को 300 रुपए और हर एक बच्चे को 150 रुपए दिए गए थे. जो नतीजे सामने आएथे उसमें देखा गया कि इससे लोगों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है और माइग्रेशन मेंकमी आई है.स्टैंडिंग के तर्कगाए स्टैंडिंग के मुताबिक काम और पैसे का हिसाब ही बड़ा गड़बड़ है. लाइन में हमखड़े रहते हैं. इसे काम नहीं माना जाता. क्या यहां मजाक चलता है? अगर आप मेड रखतेहैं तो उसको रोजगार मिलता है. देश की जीडीपी बढ़ती है. पर अगर आप उससे शादी कर लेंतो एक इंसान का रोजगार गया, जीडीपी गई और अब उसके घरेलू काम का कोई मतलब नहीं रहा.स्टैंडिंग कहते हैं कि गरीबी हटाने के सारे प्रोग्राम फेल हो चुके हैं. अगर आपसाबित करें कि आप गरीब हैं और इस गरीबी की वजह आप नहीं हैं, तभी आपको मदद मिलती है.मिलने के बाद भी बाजार जायें तो सामान पर टैक्स इतना लगता है कि पैसे का कोई फायदानहीं होता. ये पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है.इसके पक्ष में क्या बातें कही जाती हैं?1. इसमें ट्रांसपैरेंसी है. बाकी स्कीमों में शर्तें रखी जाती हैं. लेकिन इसमें ऐसानहीं है.2. स्टैंडिंग अपनी किताब ‘दि करप्शन ऑफ कैपिटलिज्म’ में लिखते हैं, ‘सरकारेंकंपनियों को सब्सिडी देती हैं. तो कंपनियां अमीर देशों में ही पहुंचती हैं. तोगरीबों को कोई फायदा नहीं होता. बेसिक इनकम फिक्स होने से लोगों में सुरक्षा आतीहै. लोग ज्यादा मन से अपना काम कर सकते हैं.3. इसके समर्थक जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर देते हैं वो ये कि इससे फ्रीडम आती है.चाहे वो लेफ्ट विंग के लोग हों या राइट विंग के, अलग-अलग समय में लोगों ने इसेसपोर्ट किया है.4. थॉमस पेन का अलग ही कहना था. कहते हैं कि इससे लोगों में ना कहने की ताकत आतीहै. दुनिया की ज्यादातर संपत्ति पर कुछ लोगों ने कब्जा जमा लिया है. गरीब लोगों कोकुछ मिलता ही नहीं. कुछ मिलेगा तो अपने लिए बोलना आ जाएगा.5. ये कॉन्सेप्ट सोशलिज्म के नजदीक लग सकता है लेकिन इसमें संसाधनों की जगह पैसोंपर बराबर अधिकार की बात की जाती है.6. 2008-09 में नामीबिया के एक गांव ओमितारा में चलाए गए पायलट प्रोजेक्ट में देखागया कि इससे लोगों की परचेजिंग पॉवर बढ़ गई है. छोटे-छोटे कई बिजनेस शुरू हो गए.इस बेसिक इनकम स्कीम में गड़बड़ क्या है?1. आलोचक मानते हैं कि लोग काम करना बंद कर देंगे.2. काम नहीं करेंगे तो सरकार को ज्यादा टैक्स नहीं मिलेगा. फिर बाकी के सरकारी कामरुकने लगेंगे.3. एक स्टडी में कहा गया है कि इसके फायदे हमेशा नहीं मिलते. कई जगहों पर काम केघंटों में 5 फीसदी तक गिरावट देखी गई है. औरतों को लेकर दो ग्रुप हैं. एक ग्रुपकहता है कि इससे उन औरतों को मदद मिलेगी, जो घर में काम करती हैं, लेकिन उनके कामको वैल्यू नहीं दी जाती. दूसरा मानता है कि इससे औरतों को मेन वर्कफ़ोर्स में आनेमें दिक्कत होगी, जहां पुरुषों का वर्चस्व है.इसे लागू करने में दिक्कतें क्या हैं?1. इससे टैक्स सिस्टम में बहुत से बदलाव करने होंगे और इससे शैडो इकॉनमी या ब्लैकइकॉनमी में भी बाढ़ आ सकती है.2. ये आइडिया स्विट्जरलैंड में कुछ महीने पहले पेश किया गया. इस बारे में जनमतसंग्रह कराया गया और जनता ने इस आइडिया को खारिज कर दिया. क्या इंडिया में ये पॉसिबल है?1. UBI के तहत जो आइडियल इनकम मानी जाती है वो 1,090 रूपए है. तेंदुलकर कमेटी ने भीBPL परिवारों की महीने की आय यही बताई थी. सारे भारतीयों को इतना अमाउंट देने काकुल पैसा भारत की GDP के 12.5 फीसदी के बराबर होगा. इतना तो कुल केंद्र सरकार काबजट होता है.2. ये भी कहा जाता है कि हजार से कम रुपए भी दिए जा सकते हैं. इस हिसाब से अगर एकमहीने में एक को एवरेज 450 रुपए दिए जाएं तो ये कुल GDP का 5.1 फीसदी ही होगा.3. इस तरह की स्कीम से बेरोजगारी बढ़ सकती है. फिर इतनी बड़ी जनसंख्या को इस तरह पैसेदेना नामुमकिन तो नहीं पर बहुत कठिन ज़रूर है. पैसे हथियाने के लिए गलत रास्ते भीचुने जा सकते हैं. इंडिया में तो लोग तुरंत जुगाड़ भिड़ाने लगते हैं.4. देश के पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम की बुरी हालत है. केंद्र और राज्य सरकारोंके बीच तालमेल की कमी है. देश की अर्थव्यवस्था पर अचानक बोझ बढ़ जाएगा. देश नेअभी-अभी नोटबंदी का सामना किया है. देखने में तो ये स्कीम लोगों को ललचाऊ ही नज़र आसकती है. चुनाव भी नजदीक हैं. सरकार को इस तरह की योजना चलाने से पहले बड़े स्तर परबहस करवानी चाहिए. अगर सरकार गंभीर है तो इसे चुनावों तक तो टाला ही जा सकता है.वरना यहां 'मुफ्त' के नाम पर किसी एक के पक्ष में लहर बनते देर नहीं लगती.--------------------------------------------------------------------------------ये स्टोरी निशांत ने की है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें-क्या BJP इस अटैची का इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए करेगी?इनको मोदी के पोस्टरों से भी कोई ममता नहीं हैइनको मोदी के पोस्टरों से भी कोई ममता नहीं है