बजट सेशन चल रहा है. राहुल गांधी बुधवार को बोले तो उनकी स्पीच खूब शेयर की गई.लेकिन गुरु, गुरुवार को प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी भी जवाब देने के लिए लोकसभा मेंखड़े हुए और फिर देर तक बोले. राहुल का नाम लिए बिना उनकी मौज ले ली. बोले कि कुछलोगों की उम्र तो बढ़ जाती है लेकिन समझ नहीं बढ़ती. कांग्रेस को उनके ही सीनियरनेताओं जवाहर लाल नेहरू और राजीव गांधी के भाषणों का उदाहरण देकर याद दिलाया किसंसद की कार्यवाही में रुकावट नहीं डालनी चाहिए. पढ़िए प्रधानमंत्रीकी पूरी स्पीच.'कुछ लोग खुद को जवाबदेह नहीं मानते. कुछ लोग सवालों का जवाब नहीं देते. सार्वजनिकजिंदगी में हम सब जवाबदेह हैं. मोदी ने साल 2013 में राहुल के अध्यादेश फाड़ने काभी जिक्र किया. मोदी बोले- 2013 की बात को देश भुला नहीं सकता. कांग्रेस ने मनरेगालागू किया. खड़गे ने कहा, मनरेगा में करप्शन है. मैं उनकी इस बात से एक हजार फीसदीसहमत हूं.' 'विपक्ष में भी ऐसे होनहार, तेजस्वी सांसद हैं. उन्हें सुनना अपने आपमें असेट है. सदन चलेगा तो उनको बोलने का मौका मिलेगा. लेकिन फिर हमारा क्या होगा,ये चिंता सता रही है. ये इनफिरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स का परिणाम है. कितने शानदारविचार रखते हैं, पिछले दो सदन में उनका लाभ ही नहीं मिला. कुछ लोग हैं, मनोरंजन भीकरवाते हैं. जब मैं खुद पढ़ता रहता हूं तो कुछ बातें अच्छी लगती हैं. मजाक नहींउड़ाना चाहिए. मेक इन इंडिया का मजाक उड़ा रहे हैं हम? ये देश के लिए है. सफल नहींहुआ तो क्या कमी है, इस पर बात करनी चाहिए. जाने ऐसा क्यों है कि हम लोग अपने देशकी इमेज ऐसे बनाते हैं, जैसे हम भीख का कटोरा लेकर निकले हों. जब हम खुद ऐसा कहतेहैं तो दूसरे लोग यही बात और ज्यादा चीखकर कहते हैं. ये मैं नहीं कह रहा हूं,श्रीमती इंदिरा गांधी कह रही हैं, 1974 में इंद्रप्रस्थ कॉलेज में उन्होंने ये बातकही थी. हम कोई भी नई योजना लाए, नए तरीके से लाए. लेकिन कुछ लोगों की उमर तो बढ़तीहै, लेकिन समझ नहीं बढ़ती. कुछ लोगों को समझने में वक्त लगता है. कुछ लोग समय बीतनेके बाद भी नहीं समझ पाते. हमारे देश में बहुत सी दिक्कतें हैं. ज्यादातर बहुतपुरानी हैं. गरीबी, पिछड़ापन, गलत परंपराएं. कुछ समस्याएं विकास और तरक्की के साथभी आई हैं. लेकिन इस देश की सबसे बड़ी चुनौती है, तेजी से हो रहे बदलाव का विरोध.ये विरोध पढ़ा लिखा तबका भी मुखर होकर करता है. जैसे ही कोई खास काम आगे बढ़ता है,सौ कारण बताए जाने लगते हैं कि इसे क्यों नहीं करना चाहिए. मुझे लगता है कि एकमजबूत ऊंची दीवार ने हमें घेरकर रखा है. कितनी सटीक बात है. ये 1968 में इंदिरागांधी ने कही थी.' 'हमें बड़ों की सलाह माननी चाहिए. पिछले दिनों सदन में जो हुआउससे देश पीड़ित भी है, चिंतित है. सदन नहीं चलता है तो सत्ता पक्ष का नुकसान कमहोता है, देश का नुकसान बहुत होता है. लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान विपक्ष के सांसदोंका होता है. इसलिए संसद में कितना ही विरोधी विचार, नाराजगी क्यों न हो, लेकिन वोप्रकट होना, ये आवश्यकता है. सदन एक ऐसा फोरम है, जहां तर्क रखे जाते हैं, जहांतीखे जवाब दिए जाते हैं, जहां सरकार पर सवाल किए जाते हैं, जहां सरकार को अपना बचावकरना होता है. बहस के दौरान किसी को बख्शा नहीं जाता और उसकी उम्मीद भी नहीं कीजानी चाहिए. मैं एक और बात कहना चाहता हूं. मैं सदन के सभी सदस्यों को बिल पासकराने में मदद करने का न्योता देता हूं. ये बिल लोगों के लिए है. बिल इसलिए जरूरीहै ताकि सिस्टम से दलालों को खत्म किया जा सके, प्रशासन को जवाबदेह बनाया जा सके,योजनाओं में आम जनता की भूमिका बढ़ाई जा सके. सामाजिक न्याय, विकास में. लोकतंत्रकी दुनिया को मदद करने के लिए है. ये भी नरेंद्र मोदी नहीं, हमारे भूतपूर्वप्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा है. और हमें बड़ों की बात माननी चाहिए. सदन कोरोकने के संबंध में कुछ बातों की चर्चा जरूरी लगती है. हमारे भूतपूर्व स्पीकरसोमनाथ चटर्जी ने कहा कि ऐसे मुद्दों पर जिनके बारे में धारणा होती है कि वेमहत्वपूर्ण हैं, सदन को रोकना काउंटरप्रोडक्टिव है. दुर्भाग्य से लोगों को लगता हैकि सदन को स्थगित करा देने पर उस मुद्दे का महत्व स्थापित हो जाएगा. दुर्भाग्य सेलगभग सभी राजनीतिक दल और यहां तक कि छोटे दलों का भी ऐसा ही नजरिया दिखाई देता है.मैं एक और बात को कहना चाहता हूं. यहां हम संसद में भारत के संप्रभु बॉडी का मेंबरहोने से बड़ी जिम्मेदारी कुछ नहीं हो सकती. अत: इन 5 वर्षों के दौरान हम अपनेकार्यों में न केवल इतिहास के किनारे खड़े रहें, बल्कि इतिहास बनाने के बारे में भीकाम करें. यह बात पहले प्रधानमंत्री आदरणीय जवाहरलाल नेहरू ने 1957 में कही थी. तबतो हम में से कोई नहीं था. इसी लोकसभा में हो-हल्ले के बीच आपकी दृढ़ता और उच्चमनोबल के कारण कुछ बिल पास हुए पर आगे नहीं पहुंच पाए. कल से सुन रहे हैं कि GSTबिल हमारा है, हमारा है. ये भी तो आप ही का है. राष्ट्रपति जी संविधान के बड़ेव्यक्ति हैं. उनकी सलाह हम सब जरूर मानेंगे. पहली बार के सांसद के विचार हैं,प्रधानमंत्री के तौर पर नहीं.' (किसी ने कहा कि आपकी कथनी और करनी में बहुत अंतरहैं. तब मोदी बोले- थैंक्यू. 14 साल से बहुत प्रमाण पत्र मुझे मिल रहे हैं. एक औरसही. मैं सिर झुका के आपका आदर करता हूं.) 'क्या हम वर्ष में दो सत्र के समय, एकहफ्ता ऐसा हो जिसमें सिर्फ पहली बार के सांसदों को बोलने के लिए निमंत्रित कियाजाए. इसलिए नहीं कि मैं फर्स्ट टाइमर हूं. लेकिन हमें ताजगी भरी हवा इस सदन मेंविचारों की जरूरत मुझे महसूस होती है. एक तीसरा मेरा सुझाव है कि हमारे यहांसस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल, सारे देशों ने मिलकर तय किया. सुषमा जी ने उसके लिए बहुतअच्छा शब्द दिया. टिकाऊ विकास लक्ष्य. एक सत्र के दौरान एक या दो दिन हम सब मिलकरअंतरराष्ट्रीय जगत में जो लक्ष्य तय हुए, उसमें भारत की भूमिका को चरितार्थ करने केलिए हम बहस कर सकते हैं. जिसमें राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति और मानवता हो. सरकार येहो या सरकार वो हो. भले शिक्षा राज्यों का विषय हो, लेकिन हमारी प्राथमिक शिक्षा परध्यान देना होगा. पानी भी हमारे सामने सामाजिक जिम्मेदारी का काम है. न्याय मेंविलंब. उसके रास्ते क्या हों, इस तरह के विषय हम तय करें.'